Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 252

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- देवातिथिः काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣡था꣢ गौ꣣रो꣢ अ꣣पा꣢ कृ꣣तं꣢꣫ तृष्य꣣न्ने꣡त्यवे꣢रिणम् । आ꣣पित्वे꣡ नः꣢ प्रपि꣣त्वे꣢꣫ तूय꣣मा꣡ ग꣢हि꣣ क꣡ण्वे꣢षु꣣ सु꣢꣫ सचा꣣ पि꣡ब꣢ ॥२५२॥

य꣡था꣢꣯ । गौ꣣रः꣢ । अ꣣पा꣢ । कृ꣣त꣢म् । तृ꣡ष्य꣢न् । ए꣡ति꣢꣯ । अ꣡व꣢꣯ । इ꣡रि꣢꣯णम् । आ꣣पित्वे꣢ । नः꣣ । प्रपित्वे꣢ । तू꣡य꣢꣯म् । आ । ग꣣हि । क꣡ण्वे꣢꣯षु । सु । स꣡चा꣢꣯ पि꣡ब꣢꣯ ॥२५२॥

Mantra without Swara
यथा गौरो अपा कृतं तृष्यन्नेत्यवेरिणम् । आपित्वे नः प्रपित्वे तूयमा गहि कण्वेषु सु सचा पिब ॥

यथा । गौरः । अपा । कृतम् । तृष्यन् । एति । अव । इरिणम् । आपित्वे । नः । प्रपित्वे । तूयम् । आ । गहि । कण्वेषु । सु । सचा पिब ॥२५२॥

Samveda - Mantra Number : 252
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(यथा) जैसे (गौरः) मृग-जाङ्गल पशु—हरिण (तृष्यन्) प्यासा हुआ प्यास को प्राप्त हुआ (इरिणम्) तृणादि ओषधियों से अनाच्छादित निर्मल दृश्यमान “इरिणः—अपरता अस्मादोषधय इति वा” [निरु॰ ९.६] (अपाकृतम्) ‘अद्भिः कृतम्’ जल भरे स्थान—जलाशय को (अव-एति) अवतरित होता दौड़कर प्राप्त होता है ऐसे (आपित्वे प्रपित्वे) बन्धुत्व प्राप्त हो जाने पर (नः) हमें (तूयम्-आगहि) हे परमात्मन्! शीघ्र “तूयं क्षिप्रनाम” [निघं॰ २.१५] प्राप्त हो (कण्वेषु सचा सुपिब) हम मेधावी उपासकों के अन्दर साक्षात् होकर हमारे साथ सम्बन्ध करके सुन्दर उपासनारस का पान कर स्वीकार कर।
Essence
हे परमात्मन्! जैसे प्यासा हरिण तृणादि से न ढके जलाशय को शीघ्र प्राप्त होता है ऐसे ही तू हमारे बन्धुत्व प्राप्त होने पर हम मेधावी उपासकों में प्राप्त साक्षात् होकर हमारे साथ बन्धुत्व कर हमारे सुन्दर उपासनारस को पिया कर—स्वीकार किया कर॥१०॥
Special
ऋषिः—देवातिथिः (उपास्य देव के लिये—उसकी प्राप्ति के लिये निरन्तर गति प्रवृत्तिशील मेधावी का शिष्य)॥