Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 246

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣢ म꣣न्द्रै꣡रि꣢न्द्र꣣ ह꣡रि꣢भिर्या꣣हि꣢ म꣣यू꣡र꣢रोमभिः । मा꣢ त्वा꣣ के꣢ चि꣣न्नि꣡ ये꣢मु꣣रि꣢꣫न्न पा꣣शि꣢꣫नोऽति꣣ ध꣡न्वे꣢व꣣ ता꣡ꣳ इ꣢हि ॥२४६॥

आ꣢ । म꣣न्द्रैः꣢ । इ꣣न्द्र । ह꣡रि꣢꣯भिः । या꣣हि꣢ । म꣣यू꣡र꣢रोमभिः । म꣣यू꣡र꣢ । रो꣣मभिः । मा꣢ । त्वा꣣ । के꣢ । चित् । नि꣢ । ये꣣मुः । इ꣢त् । न । पा꣣शि꣡नः꣢ । अ꣡ति꣢꣯ । ध꣡न्व꣢꣯ । इ꣣व । ता꣢न् । इ꣣हि ॥२४६॥

Mantra without Swara
आ मन्द्रैरिन्द्र हरिभिर्याहि मयूररोमभिः । मा त्वा के चिन्नि येमुरिन्न पाशिनोऽति धन्वेव ताꣳ इहि ॥

आ । मन्द्रैः । इन्द्र । हरिभिः । याहि । मयूररोमभिः । मयूर । रोमभिः । मा । त्वा । के । चित् । नि । येमुः । इत् । न । पाशिनः । अति । धन्व । इव । तान् । इहि ॥२४६॥

Samveda - Mantra Number : 246
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन्! तू (मयूररोमभिः-मन्द्रैः-हरिभिः) मोरपक्षी के रोमसदृश कमनीय अपनी रश्मियों—ज्ञान ज्योतियों के द्वारा जो तेरे स्वरूप को प्रदर्शित करती हुई तुझे हमारे तक लाने वाली और हमें तेरे तक पहुँचाने वाली हैं उनके द्वारा (आयाहि) समन्तरूप से हमें प्राप्त हों (केचित्) कोई अन्य (त्वा मा नियेमुः-इत्) तुझे न निरुद्ध करें—रोकें (पाशिनः-न) पाशवाले व्याध जनों की भाँति (धन्व-इव तान्-अतीहि) अथवा वे बाधक आ भी खड़े हों तो उन्हें मरुदेशों की भाँति अतिक्रमण करके प्राप्त हो।
Essence
हे परमात्मन्! तू मोरपक्षी की चमक दमक सुन्दर रोम समान कमनीय ज्ञान रश्मियाँ—ज्ञान ज्योतियाँ जो कि तेरे स्वरूप को प्रदर्शित करती हुई हमारे तक तुझे लाने वाली और हमें तेरे तक पहुँचाने—आकर्शित करने वाली हैं उनके द्वारा समन्तरूप से प्राप्त हो। परमात्मन्! इस तेरे आगमन को रोकने वाला कोई भी दोष हमारे अन्दर उत्पन्न न हो जो हमारी सद्वृत्तियों को व्याध के समान रोककर तुझे हमारे तक पहुँचने में बाधक हो जावे, तथा हमारे से अन्यों द्वारा प्रसिद्ध किए अन्यथा दोषों को तू मरुप्रेदश के समान शुष्कनीरस समझकर लाङ्घकर प्राप्त हो॥४॥
Special
ऋषिः—विश्वामित्रः (सबसे स्नेह करने वाला सबका मित्र)॥