Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 242

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रगाथो घौरः काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
मा꣡ चि꣢द꣣न्य꣡द्वि श꣢꣯ꣳसत꣣ स꣡खा꣢यो꣣ मा꣡ रि꣢षण्यत । इ꣢न्द्र꣣मि꣡त्स्तो꣢ता꣣ वृ꣡ष꣢ण꣣ꣳ स꣡चा꣢ सु꣣ते꣡ मुहु꣢꣯रु꣣क्था꣡ च꣢ शꣳसत ॥२४२॥

मा꣢ । चि꣣त् । अन्य꣢त् । अ꣣न् । य꣢त् । वि । शँ꣣सत । स꣡खा꣢꣯यः । स । खा꣣यः । मा꣢ । रि꣣षण्यत । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । इत् । स्तो꣣त । वृ꣡ष꣢꣯णम् । स꣡चा꣢꣯ । सु꣣ते꣢ । मु꣡हुः꣢꣯ । उ꣣क्था꣢ । च꣣ । शँसत ॥२४२॥

Mantra without Swara
मा चिदन्यद्वि शꣳसत सखायो मा रिषण्यत । इन्द्रमित्स्तोता वृषणꣳ सचा सुते मुहुरुक्था च शꣳसत ॥

मा । चित् । अन्यत् । अन् । यत् । वि । शँसत । सखायः । स । खायः । मा । रिषण्यत । इन्द्रम् । इत् । स्तोत । वृषणम् । सचा । सुते । मुहुः । उक्था । च । शँसत ॥२४२॥

Samveda - Mantra Number : 242
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(सखायः) हे समान वृत्ति वाले उपासको! (अन्यत्) परमात्मा से भिन्न की (मा विशंसत) मत विशेष प्रशंसा करो (मा रिषण्यत) मत अपना हिंसन चाहो परमात्मा से भिन्न की प्रशंसा में आत्महिंसा है—“आत्मनो रिषणमिच्छत क्यजन्तः प्रयोगः” (वृषणम्-इन्द्रम्-इत् स्तोत) सुखवर्षक परमात्मा की स्तुति करो (सुते) निष्पन्न उपासनारस पर (सचा) साथ (च) और (मुहुः-उक्था) पुनः पुनः स्तुति वचनों का—से (शंसत) प्रशंसा करो।
Essence
हे उपासक मित्रो! परमात्मा से भिन्न की उसके स्थान पर स्तुति न करो, उससे भिन्न की उपासना से अपनी हिंसा है—आत्मवञ्चना है उससे बचो सुखवर्षक परमात्मा की ही स्तुति करो निष्पन्न उपासनारस प्रसङ्ग में पुनः पुनः स्तुति वचन उच्चारित करो॥१०॥
Special
ऋषिः—प्रगाथः काण्वः (मेधावी का शिष्य उत्तम स्तुति वाणी वाला)॥