Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 234

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त्वा꣡मिद्धि हवा꣢꣯महे सा꣣तौ꣡ वाज꣢꣯स्य का꣣र꣡वः꣢ । त्वां꣢ वृ꣣त्रे꣡ष्वि꣢न्द्र꣣ स꣡त्प꣢तिं꣣ न꣢र꣣स्त्वां꣢꣫ काष्ठा꣣स्व꣡र्व꣢तः ॥२३४॥

त्वा꣢म् । इत् । हि । ह꣡वा꣢꣯महे । सा꣣तौ꣢ । वा꣡ज꣢꣯स्य । का꣣र꣡वः꣢ । त्वाम् । वृ꣣त्रे꣡षु꣢ । इ꣣न्द्र । स꣡त्प꣢꣯तिम् । सत् । प꣣तिम् । न꣡रः꣢꣯ । त्वाम् । का꣡ष्ठा꣢꣯सु । अ꣡र्व꣢꣯तः ॥२३४॥

Mantra without Swara
त्वामिद्धि हवामहे सातौ वाजस्य कारवः । त्वां वृत्रेष्विन्द्र सत्पतिं नरस्त्वां काष्ठास्वर्वतः ॥

त्वाम् । इत् । हि । हवामहे । सातौ । वाजस्य । कारवः । त्वाम् । वृत्रेषु । इन्द्र । सत्पतिम् । सत् । पतिम् । नरः । त्वाम् । काष्ठासु । अर्वतः ॥२३४॥

Samveda - Mantra Number : 234
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे परमात्मन्! (कारवः) हम तेरे स्तोता—वाणी से स्तुति करने वाले होते हुए “कारुः स्तोतृनाम” [निघं॰ ३.१६] (वाजस्य सातौ) अमृत अन्न-मोक्ष के अमृत भोग की सम्भक्ति—प्राप्ति के निमित्त “अमृतोऽन्नं वै वाजः” [जै॰ २.१९३] (त्वाम्-इत्-हि) केवल तुझे ही (हवामहे) आमन्त्रित करते हैं—स्मरण करते हैं—उपासते हैं (नरः) हम नयनकर्ता—पथप्रदर्शक देवश्रेणी में होते हुए—मन से प्रार्थना ध्यान चिन्तन करते हुए भी “नरो ह वै देवविशः” [जै॰ १.८९] (वृत्रेषु) पाप प्रसङ्गों—पाप भावनाओं से बचे रहने के निमित्त “पाप्मा वै वृत्रः” [रा॰ ११.१.५.७] (त्वां सत्पतिम्) तुझ सत्पुरुषों के रक्षक को स्मरण करते हैं (अर्वतः) तथा “अर्वन्तः प्रथमार्थे द्वितीया छान्दसी” हम आत्मा से उपासना—उसके सामीप्य को प्राप्त करने वाले परम पुरुषार्थ करने वाले उत्तमाधिकारी जीवन्मुक्त होते हुए भी “पुमांसोऽर्वन्तः” [श॰ ३.३.४.७] (काष्ठासु) संसार की या बन्धन की सीमाओं को पार करने में—प्रकृति के अन्तिम स्तरों को पार करने में “सुवर्गो वै लोकः काष्ठाः” [तै॰ १.३.६.५] (त्वाम्) तुझे स्मरण करते हैं।
Essence
परमात्मन्! तेरे अमृत भोग की प्राप्ति के निमित्त हम वाणी से तेरी स्तुति करते हुए या मन से प्रार्थना ध्यान करते हुए और ऊँचे उठे हुए देवश्रेणी में होते हुए या और ऊँचे उठे हुए आत्मभाव से उपासना करते हुए संसार की दुःखमय बन्धन सीमाओं को पार करने के लिये तुझ श्रेष्ठ जनों के रक्षक का आमन्त्रण—स्मरण करते हैं॥२॥
Special
ऋषिः—भारद्वाजः (परमात्मा के अमृत भोग को धारण करने में समर्थ उपासक)॥