Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 228

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- दुर्मित्रः कौत्सः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
क꣣दा꣡ व꣢सो स्तो꣣त्रं꣡ हर्य꣢꣯त आ꣡ अव꣢꣯ श्म꣣शा꣡ रु꣢ध꣣द्वाः꣢ । दी꣣र्घ꣢ꣳ सु꣣तं꣢ वा꣣ता꣡प्या꣢य ॥२२८॥

क꣣दा꣢ । व꣣सो । स्तोत्र꣢म् । ह꣡र्य꣢꣯ते । आ । अ꣡व꣢꣯ । श्म꣣शा꣢ । रु꣣धत् । वा꣡रिति꣢दी꣣र्घ꣢म् । सु꣣त꣢म् । वा꣣ता꣡प्या꣢य । वा꣣त । आ꣡प्या꣢꣯य ॥२२८॥

Mantra without Swara
कदा वसो स्तोत्रं हर्यत आ अव श्मशा रुधद्वाः । दीर्घꣳ सुतं वाताप्याय ॥

कदा । वसो । स्तोत्रम् । हर्यते । आ । अव । श्मशा । रुधत् । वारितिदीर्घम् । सुतम् । वाताप्याय । वात । आप्याय ॥२२८॥

Samveda - Mantra Number : 228
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 12;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(वसो) हे सबमें बसनेवाले परमात्मन्! (स्तोत्रं हर्यते) मेरे स्तोत्र-स्तवन—स्तुतिवचन को चाहते हुए तुझसे प्रार्थना करता हूँ (श्मशा) यह आनन्दरस बहानेवाली धारा “श्मशा शु अ अश्नुत इति वाश्माश्नुन इति वा” [निरु॰ ५.१२] (कदा-वाः-आ-अवरुधत्) कब तक आनन्दरस को बन्द रखेगी (दीर्घं सुतं वाताप्याय) कभी से—बहुत काल से निष्पादित उपासनारस मुझ स्तोता की ओर लाने के लिए चालू होगी।
Essence
सबमें बसने वाले परमात्मन्! तू स्तुतिवचन को चाहने वाला है, तेरे आनन्दरस को रोकने वाली धारा कब तक रुकी रहेगी? कभी तो चालू होगी ही क्योंकि दीर्घकाल से यह निष्पन्न उपासनारस तेरे प्रति समर्पण किया जा रहा है कभी तो मुझे अपना आनन्दरस प्रवाहित करने को प्रेरित करेगा॥६॥
Special
ऋषिः—कौत्सो दुर्मित्रः (अतिशय से स्तोमों स्तुतियों को करने वाला—दुष्ट का भी मित्र—सर्व हितैषी)॥