Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 227

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣢ या꣣ह्यु꣡प꣢ नः सु꣣तं꣡ वाजे꣢꣯भि꣣र्मा꣡ हृ꣢णीयथाः । म꣣हा꣡ꣳ इ꣣व꣢ यु꣡व꣢जानिः ॥२२७॥

आ꣢ । या꣣हि । उ꣡प꣢꣯ । नः꣣ । सुत꣢म् । वा꣡जे꣢꣯भिः । मा । हृ꣣णीयथाः । महा꣢न् । इ꣣व । यु꣡व꣢꣯जानिः । यु꣡व꣢꣯ । जा꣣निः ॥२२७॥

Mantra without Swara
आ याह्युप नः सुतं वाजेभिर्मा हृणीयथाः । महाꣳ इव युवजानिः ॥

आ । याहि । उप । नः । सुतम् । वाजेभिः । मा । हृणीयथाः । महान् । इव । युवजानिः । युव । जानिः ॥२२७॥

Samveda - Mantra Number : 227
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 12;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(नः) हमारे (सुतम्) निष्पन्न उपासनारस के प्रति—उसे स्वीकार करने के लिये (वाजेभिः) अपने अमृत सुख भोगों के साथ (उपायाहि) समीप आ (मा हृणीयथाः) मत क्रोध करना ‘हृणीयते क्रुध्यतिकर्मा’ [निघं॰ २.१३] (महान् युवजानि-इव) महान् युवति पत्नी वाले के समान।
Essence
हे परमात्मन्! हमारे निष्पादित उपासनारस को प्राप्त हो, स्वीकार कर, अपने अमृत भोगों के साथ, तू हम पर कभी क्रोध नहीं करना जैसे युवति पत्नी वाला अपनी सुखभोग युवति पत्नी पर क्रोध नहीं करता। हम तेरे प्रति सदा उपासनारस प्रदान में समर्थ हैं॥५॥
Special
ऋषिः—मेधातिथिप्रियमेधावृषी (मेधा से अतन गमनशील और प्रिय है मेधा जिसको ऐसे उपासक)॥