Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 225

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
उ꣣क्थं꣢ च꣣ न꣢ श꣣स्य꣡मा꣢नं꣣ ना꣡गो꣢ र꣣यि꣡रा चि꣢꣯केत । न꣡ गा꣢य꣣त्रं꣢ गी꣣य꣡मा꣢नम् ॥२२५॥

उ꣣क्थ꣢म् । च꣣ । न꣢ । श꣣स्य꣡मा꣢नम् । न । अ꣡गोः꣢꣯ । अ । गोः꣣ । रयिः꣢ । आ । चि꣣केत । न꣢ । गा꣣यत्रम् । गी꣣य꣡मा꣢नम् ॥२२५॥

Mantra without Swara
उक्थं च न शस्यमानं नागो रयिरा चिकेत । न गायत्रं गीयमानम् ॥

उक्थम् । च । न । शस्यमानम् । न । अगोः । अ । गोः । रयिः । आ । चिकेत । न । गायत्रम् । गीयमानम् ॥२२५॥

Samveda - Mantra Number : 225
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 12;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अगोः) “गौः स्तोता” [निघं॰ ३.१६] ‘अगोः-अस्तोता तद्विरुद्धो नास्तिकः’ नास्तिक जन के (न-उक्थम्) न प्रार्थनावचन को (च) और (न शस्यमानम्) न स्तुतिवचन को (न गीयमानं गायत्रम्) न गाने योग्य उपासना को (रयिः) ‘रयिमान्’ ऐश्वर्यवान् इन्द्र—परमात्मा “मतुब्लोपश्छान्दसः” (आचिकेत) मानता है—स्वीकार करता है।
Essence
ऐश्वर्यवान् परमात्मा अपने विरोधी नास्तिक की दम्भ या प्रदर्शन या भय या लोभ से—की गई प्रार्थना, स्तुति, उपासना को कभी स्वीकार नहीं करता, वह परमात्मा के ऐश्वर्यस्वरूप का लाभ नहीं उठा सकता है॥३॥
Special
ऋषिः—मेधातिथिः प्रियमेधा च (मेधा से गमन करने वाला तथा प्रिय है मेधा सङ्गमनीय परमात्मा जिसको ऐसा उपासक)॥