Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 223

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡ती꣢हि मन्युषा꣣वि꣡ण꣢ꣳ सुषु꣣वा꣢ꣳस꣣मु꣡पे꣢꣯रय । अ꣣स्य꣢ रा꣣तौ꣢ सु꣣तं꣡ पि꣢ब ॥२२३॥

अ꣡ति꣢꣯ । इ꣣हि । मन्युषावि꣡ण꣢म् । म꣣न्यु । सावि꣡न꣢म् । सु꣣षुवाँ꣡स꣢म् । उ꣡प꣢꣯ । आ । ई꣣रय । अस्य꣢ । रा꣣तौ꣢ । सु꣣त꣢म् । पि꣣ब ॥२२३॥

Mantra without Swara
अतीहि मन्युषाविणꣳ सुषुवाꣳसमुपेरय । अस्य रातौ सुतं पिब ॥

अति । इहि । मन्युषाविणम् । मन्यु । साविनम् । सुषुवाँसम् । उप । आ । ईरय । अस्य । रातौ । सुतम् । पिब ॥२२३॥

Samveda - Mantra Number : 223
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 12;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(मन्युषाविणम्-अतीहि) ‘मन्युं क्रोधं सुनोति यः स मन्युषावी तम्’ मन्यु-क्रोध स्रवित करनेवाले को तिरस्कृत कर (सुषुवांसम्-उपेरय) उपासनारसप्रस्रावी को ऊपर प्रेरित—उन्नत कर अपने समीप ले (अस्य रातौ) इस मुक्त सोमस्रावी के दान में—आत्मसमर्पण में (सुतं पिब) निष्पादित उपासनारस को स्वीकार कर।
Essence
परमात्मन्! तू क्रोधस्रावी क्रोध करनेवाले जन को तिरस्कृत करता है किन्तु उपासनारस स्रावी को तू ऊपर उठाता अपने पास लेता है यह तेरा स्वभाव है अतः मुझ इस उपासनारसस्रावी के आत्मसमर्पण प्रसङ्ग में निष्पन्न उपासनारस को तू स्वीकार करता है॥१॥
Special
ऋषिः—मेधातिथिः (मेधा से गमनशील प्रवेशशील)॥