Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 222

1875 Mantra
Devata- विष्णुः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣दं꣢꣫ विष्णु꣣र्वि꣡ च꣢क्रमे त्रे꣣धा꣡ नि द꣢꣯धे प꣣द꣢म् । स꣡मू꣢ढमस्य पाꣳसु꣣ले꣡ ॥२२२॥

इ꣣द꣢म् । वि꣡ष्णुः꣢꣯ । वि । च꣣क्रमे । त्रेधा꣢ । नि । द꣣धे । पद꣢म् । स꣡मू꣢꣯ढम् । सम् । ऊढम् । अस्य । पासुले꣢ ॥२२२॥

Mantra without Swara
इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् । समूढमस्य पाꣳसुले ॥

इदम् । विष्णुः । वि । चक्रमे । त्रेधा । नि । दधे । पदम् । समूढम् । सम् । ऊढम् । अस्य । पासुले ॥२२२॥

Samveda - Mantra Number : 222
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 11;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(विष्णुः) व्यापक एवं तीनों लोकों में और तीनों से बाहर भी इन्द्र—परमात्मा “विष्णुर्विषितो भवति” “विशतेर्वा व्यश्नोतेर्वा” [नि॰ १२.१९] (इदं विचक्रमे) इस समस्त जगत् को स्वाधीन किए हुए हैं (त्रेधा-पदं-निदधे) तीन—तीनों स्थानों—द्युलोक में, अन्तरिक्ष में और पृथिवी लोक में अपना शक्तिस्वरूप रखता है (अस्य-पांसुले (रे) समूढम्) इसका स्वरूप इसके एकदेशी न होने से धूल राशि में पड़े पद की भाँति पद दृष्टिपथ नहीं होता, उसे तो योगी उपासक जन ही उस अन्तर्निहित स्वरूप को अपने आत्मा में देखता है।
Essence
व्यापक ऐश्वर्यवान् परमात्मा इस सारे जगत् को अपनी व्याप्ति से स्वाधीन किए हुए है और द्युलोक अन्तरिक्ष पृथिवी लोक—तीनों लोकों में इसका स्वरूप निहित है वह धूलि में रखे पद की भाँति दृष्टि पथ नहीं होता, परन्तु उपासक जन अपनी अन्तरात्मा में निहित उसके पद-स्वरूप का साक्षात् करता है॥९॥
Special
ऋषिः—मेधातिथिः (मेधा से परमात्मा में गमन प्रवेश—करने वाला)॥