Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 221

1875 Mantra
Devata- मरुतः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
उ꣢दु꣣ त्ये꣢ सू꣣न꣢वो꣣ गि꣢रः꣣ का꣡ष्ठा꣢ य꣣ज्ञे꣡ष्व꣢त्नत । वा꣣श्रा꣡ अ꣢भि꣣ज्ञु꣡ यात꣢꣯वे ॥२२१॥

उ꣢त् । उ꣣ । त्ये꣢ । सू꣣न꣡वः꣢ । गि꣡रः꣢꣯ । का꣡ष्ठाः꣢꣯ । य꣣ज्ञे꣡षु꣢ । अ꣣त्नत । वाश्राः꣢ । अ꣣भिज्ञु꣢ । अ꣣भि । ज्ञु꣢ । या꣡त꣢꣯वे ॥२२१॥

Mantra without Swara
उदु त्ये सूनवो गिरः काष्ठा यज्ञेष्वत्नत । वाश्रा अभिज्ञु यातवे ॥

उत् । उ । त्ये । सूनवः । गिरः । काष्ठाः । यज्ञेषु । अत्नत । वाश्राः । अभिज्ञु । अभि । ज्ञु । यातवे ॥२२१॥

Samveda - Mantra Number : 221
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 11;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(यज्ञेषु) अध्यात्मयज्ञों में (ये-उ) वे निश्चय (गिरः) वाणी—स्तुति के (सूनवः) प्रकट करने वाले—उच्चारण करने वाले उपासक स्तोता जन (काष्ठाः-उद्-अत्नत) दिशाओं में “काष्ठा दिक्” [निघं॰ १.६] अपनी-अपनी दिशाओं का विस्तार करते हैं (वाश्राः-अभिज्ञु यातवे) ये स्तोता स्तवन करते हुए अल्पवयस्क बालक जैसे घुटने के बल चलते हैं ऐसे परमात्मा की ओर जाने को समर्पण करते हैं।
Essence
अध्यात्मयज्ञों में वाणी स्तुति को प्रकट करने वाले स्तोता अपनी दिशा-पद्धति या भूमि का विस्तार करते हैं पुनः स्तवन करते हुए अल्पायु वाले बालक जैसे चलने को घुटने के बल चलते हैं ऐसे परमात्मा के प्रति जाने के लिये अपना समर्पण करते हैं॥८॥
Special
ऋषिः—प्रस्कण्वः (प्रकृष्ट मेधावी)॥