Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 220

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनो जमदग्निर्वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ नो꣢ मित्रावरुणा घृ꣣तै꣡र्गव्यू꣢꣯तिमुक्षतम् । म꣢ध्वा꣣ र꣡जा꣢ꣳसि सुक्रतू ॥२२०॥

आ꣢ । नः꣣ । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । घृतैः꣢ । ग꣡व्यू꣢꣯तिम् । गो । यू꣣तिम् । उक्षतम् । म꣡ध्वा꣢꣯ । र꣡जाँ꣢꣯सि । सु꣣क्रतू । सु । क्रतूइ꣡ति꣢ ॥२२०॥

Mantra without Swara
आ नो मित्रावरुणा घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम् । मध्वा रजाꣳसि सुक्रतू ॥

आ । नः । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । घृतैः । गव्यूतिम् । गो । यूतिम् । उक्षतम् । मध्वा । रजाँसि । सुक्रतू । सु । क्रतूइति ॥२२०॥

Samveda - Mantra Number : 220
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 11;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(सुक्रतू-मित्रावरुणा) शोभन प्रज्ञा कर्म वाले मित्र-स्नेही सखारूप और वरुण-वरणीय शरणद आदि रूप परमात्मा (नः) हमारी गव्यूतिम् इन्द्रियों की गतिविधि को (घृतैः) ज्ञान प्रदीपन प्रवाहों से (आ-उक्षतम्) सीञ्च दो, तथा (मध्वा रजांसि) मधुर प्रवाहों से रञ्जनात्मक मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार स्थानों को सींच दो।
Essence
परमात्मा शोभन ज्ञान कर्मवान् स्नेहीसखा रूप से इन्द्रियों को दीपन प्रवाहों से और वरुण-वरणीय शरणदानरूप मधुर प्रवाहों से मन बुद्धि चित्त अहङ्कार स्थानों को सींच देता है॥७॥
Special
ऋषिः—विश्वामित्रो जमदग्निर्वा (सबका मित्र या प्रज्वलित ध्यानाग्नि वाला)॥