Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 219

1875 Mantra
Devata- अश्विनौ, मित्रावरुणौ Rishi- ब्रह्मातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
दू꣣रा꣢दि꣣हे꣢व꣣ य꣢त्स꣣तो꣢ऽरु꣣ण꣢प्सु꣣र꣡शि꣢श्वितत् । वि꣢ भा꣣नुं꣢ वि꣣श्व꣡था꣢तनत् ॥२१९॥

दू꣣रा꣢त् । दुः꣣ । आ꣢त् । इ꣣ह꣢ । इ꣣व । य꣢त् । स꣣तः꣢ । अ꣣रुण꣡प्सुः꣢ । अ꣡शि꣢꣯श्वितत् । वि । भा꣣नु꣢म् । वि꣣श्व꣡था꣢ । अ꣣तनत् । ॥२१९॥

Mantra without Swara
दूरादिहेव यत्सतोऽरुणप्सुरशिश्वितत् । वि भानुं विश्वथातनत् ॥

दूरात् । दुः । आत् । इह । इव । यत् । सतः । अरुणप्सुः । अशिश्वितत् । वि । भानुम् । विश्वथा । अतनत् । ॥२१९॥

Samveda - Mantra Number : 219
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 11;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अरुणप्सुः) आरोचमानरूप जिसका है ऐसा इन्द्र—परमात्मा “प्सुः-रूपनाम” [निघं॰ ३.७] “वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णम्” [यजु॰ ३१.१८] (दूरात्) दृष्टिपथ से दूर होते हुए (इह-इव) यहीं समीप सा होकर हृदय में या अन्तरात्मा में होकर (यत्) यदा—जब (सतः) सत्पुरुषों—उपासकों को (अशिश्वितत्) रञ्जित कर देता है “श्विता वर्णें” [भ्वादि॰] तब (विश्वथा) सब प्रकार से (भानुम्) ज्ञानप्रकाश को (वि-अतनत्) विशेष रूप से फैलाता—बढ़ाता है।
Essence
सूर्यसमान आरोचमानरूप वाला परमात्मा दृष्टि से दूर होकर भी समीप सा हृदय में अन्तरात्मा में जब सत्पुरुषों उपासकों को रञ्जित कर देता है तब सब प्रकार ज्ञानप्रकाश को विशेषरूप से फैला देता है—बढ़ा देता है॥६॥
Special
ऋषिः—ब्रह्मातिथिः (ब्रह्म—परमात्मा में निरन्तर गति रखने वाला उपासक)॥