Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 216

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣢ बु꣣न्दं꣡ वृ꣢त्र꣣हा꣡ द꣢दे जा꣣तः꣡ पृ꣢च्छा꣣द्वि꣢ मा꣣त꣡र꣢म् । क꣢ उ꣣ग्राः꣡ के ह꣢꣯ शृण्विरे ॥२१६॥

आ꣢ । बु꣣न्द꣢म् । वृ꣣त्रहा꣢ । वृ꣣त्र । हा꣢ । द꣣दे । जातः꣢ । पृ꣣च्छात् । वि꣢ । मा꣣त꣡र꣢म् । के । उ꣣ग्राः꣢ । के । ह꣣ । शृण्विरे ॥२१६॥

Mantra without Swara
आ बुन्दं वृत्रहा ददे जातः पृच्छाद्वि मातरम् । क उग्राः के ह शृण्विरे ॥

आ । बुन्दम् । वृत्रहा । वृत्र । हा । ददे । जातः । पृच्छात् । वि । मातरम् । के । उग्राः । के । ह । शृण्विरे ॥२१६॥

Samveda - Mantra Number : 216
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 11;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(वृत्रहा) पाप अज्ञान का नाशक परमात्मा “पाप्मा वै वृत्रः” [श॰ ११.१.५.७] (जातः) अन्तरात्मा साक्षात् हुआ (बुन्दम्) “येन बुन्दन्ति निशामयन्ति शृण्वन्ति जनाः स हिरण्ययः सारङ्गवाद्यो वेदः” जिससे ज्ञान सुनते हैं वह हिरण्यय सारङ्गवाद्य वेद को “बुन्दिर् निशामने श्रवणे” [भ्वादि॰] “साधु बुन्दो हिरण्ययः” [ऋ॰ ८.७७.११—निरु॰ ६.३३] (आ-ददे) समन्तरूप से देता है (मातरं ‘मातरः’ विपृच्छत्) मान करने वाले सत्कार करने वाले उपासकों को विशेष रूप में उस वेदज्ञान से अर्चित करता है सुभूषित “पृच्छति-अर्चतिकर्मा” [निघं॰ ३.१४] जिस वेदज्ञान में (के-उग्राः) ‘के च’ कुछ ज्ञानविषय उग्रसूक्ष्मातिसूक्ष्म हैं (के ह शृण्विरे) कुछेक संसारप्रसिद्ध सुने जाने वाले हैं।
Essence
पाप अज्ञानान्धकार नाशक परमात्मा जब उपासकों—ऋषियों के अन्दर साक्षात् होता है वेदज्ञानरूप सारङ्गवाद्य को समन्तरूप से प्रदान कर प्रकाशित कर उन मान करने वाले उपासकों ऋषियों को अर्चित करता सुपूज्य बनाता है जिस वेद में कुछ ज्ञान सूक्ष्मातिसूक्ष्म है और कुछेक लोक में सुने जाने वाले साधारण हैं संसार में जीवन चलाने वाले हैं॥३॥
Special
ऋषिः—त्रिशोकः (तीनों आध्यात्मिक ज्योतियों से सम्पन्न विद्वान्१)॥