Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 214

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣢ व꣣ इ꣢न्द्रं꣣ कृ꣢विं꣣ य꣡था꣢ वाज꣣य꣡न्तः꣢ श꣣त꣡क्र꣢तुम् । म꣡ꣳहि꣢ष्ठꣳ सिञ्च꣣ इ꣡न्दु꣢भिः ॥२१४॥

आ꣢ । वः꣣ । इ꣢न्द्र꣢꣯म् । कृ꣡वि꣢꣯म् । य꣡था꣢꣯ । वा꣣जय꣡न्तः꣢ । श꣣त꣡क्र꣢तुम् । श꣣त꣢ । क्र꣣तुम् । मँ꣡हि꣢꣯ष्ठम् । सि꣣ञ्चे । इ꣡न्दु꣢꣯भिः । ॥२१४॥

Mantra without Swara
आ व इन्द्रं कृविं यथा वाजयन्तः शतक्रतुम् । मꣳहिष्ठꣳ सिञ्च इन्दुभिः ॥

आ । वः । इन्द्रम् । कृविम् । यथा । वाजयन्तः । शतक्रतुम् । शत । क्रतुम् । मँहिष्ठम् । सिञ्चे । इन्दुभिः । ॥२१४॥

Samveda - Mantra Number : 214
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 11;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(आ) आ ‘आगच्छत’ ‘उपसर्गाद् योग्यक्रियाऽध्याहारः’ (वः) ‘विभक्तिव्यत्ययः’ तुम-हम मिलकर सब (वाजयन्तः) अपने अमृत अन्न-भोग को चाहते हुए “अमृतोऽन्नं वै वाजः” [जै॰ २.१९३] (शतक्रतुम्) बहुकर्मशक्तिवाले बहुप्रज्ञान वाले (मंहिष्ठम्) महान् से महान् (इन्द्रम्) परमात्मा को (इन्दुभिः) आर्द्र उपासनारसों से (सिञ्चे) “सिञ्चामहे” सीचें—भर दें “वचनत्यव्ययः” (कृविं यथा) जैसे खुदे हुए खत्ती नामक शुष्क कूप को अन्न से भर देते हैं पुनः उसमें से अन्न प्राप्त करने के लिये। “क्रिविर्दन्ती विकर्तनदन्ती” [नि॰ ६.३०] “कृविः कूपनाम” [निघं॰ २.२३] ऐसे अमृत अन्न पाने के लिये परमात्मा को उपासनारसों से भरते हैं। भरने में उपमा है।
Essence
आओ उपासकजनो तुम और हम अपने योग्य अमृत अन्न भोग को प्राप्त करना चाहते हुए असंख्य ज्ञान कर्म वाले उपकार करने वाले महान् से महान् परमात्मा को अपने स्नेहपूर्ण उपासनारसों से भर दें जैसे खत्ती को अन्नों से भरते हैं पुनः अवसर पर अपने अन्नों को पाने के लिये॥१॥
Special
ऋषिः—आजीगर्तः शुनः शेपः (इन्द्रियभोगों की दौड़ में शरीरगर्त में गिरा विषयलोलुप छुटकारा चाहने वाला)॥