Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 213

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
तु꣡भ्य꣢ꣳ सु꣣ता꣢सः꣣ सो꣡माः꣢ स्ती꣣र्णं꣢ ब꣣र्हि꣡र्वि꣢भावसो । स्तो꣣तृ꣡भ्य꣢ इन्द्र मृडय ॥२१३॥

तु꣡भ्य꣢꣯म् । सु꣣ता꣡सः꣢ । सो꣡माः꣢꣯ । स्ती꣣र्ण꣢म् । ब꣣र्हिः꣢ । वि꣣भावसो । विभा । वसो । स्तो꣡तृभ्यः꣢ । इ꣣न्द्र । मृडय ॥२१३॥

Mantra without Swara
तुभ्यꣳ सुतासः सोमाः स्तीर्णं बर्हिर्विभावसो । स्तोतृभ्य इन्द्र मृडय ॥

तुभ्यम् । सुतासः । सोमाः । स्तीर्णम् । बर्हिः । विभावसो । विभा । वसो । स्तोतृभ्यः । इन्द्र । मृडय ॥२१३॥

Samveda - Mantra Number : 213
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 10;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(विभावसो-इन्द्र) विशेष दीप्ति को बसाने वाले परमात्मन्! (तुभ्यम्) तेरे लिये (सोमाः सुतासः) उपासनारस निष्पन्न किए हैं (बर्हिः-स्तीर्णम्) तेरे विराजने के लिये हृदयसदन भी विस्तृत है (स्तोतृभ्यः-मृडय) स्तोताओं के लिये सुख पहुँचा दे।
Essence
विशेष दीप्तियों को बसाने फैलाने वाले परमात्मन्! तेरे लिये उपासनारस निष्पन्न किये हैं और तेरे विराजने को हृदयसदन भी विशाल बनाया हुआ है तू आ विराजमान हो हम-स्तोताओं को अपने समागम से आनन्दित कर॥१०॥
Special
ऋषिः—श्रुतकक्षः (सुन लिया है अध्यात्मकक्ष जिसने ऐसा उपासक)॥