Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 209

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡रं꣢ त इन्द्र꣣ श्र꣡व꣢से ग꣣मे꣡म꣢ शूर꣣ त्वा꣡व꣢तः । अ꣡र꣢ꣳ शक्र꣣ प꣡रे꣢मणि ॥२०९

अ꣡र꣢꣯म् । ते꣣ । इन्द्र । श्र꣡व꣢꣯से । ग꣣मे꣡म꣢ । शू꣣र । त्वा꣡व꣢꣯तः । अ꣡र꣢꣯म् । श꣣क्र । प꣡रे꣢꣯मणि ॥२०९॥

Mantra without Swara
अरं त इन्द्र श्रवसे गमेम शूर त्वावतः । अरꣳ शक्र परेमणि ॥२०९

अरम् । ते । इन्द्र । श्रवसे । गमेम । शूर । त्वावतः । अरम् । शक्र । परेमणि ॥२०९॥

Samveda - Mantra Number : 209
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 10;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(शूर-इन्द्र) हे विक्रमशील या विविध प्रगतिशील परमात्मन्! (ते) तेरे (श्रवसे) श्रवणीय यश के लिये “श्रवः श्रवणीयं यशः” [निरु॰ ११.९] (त्वावतः) हम तेरे वाले—तेरे आश्रय वाले—तुझे अपना बना चुके हुए (अरं गमेम) समर्थ हो जावें, तथा (शक्र परेमणि-अरम्) हे परमात्मन्! तेरे परत्वे-पर-अभीष्ट मोक्षस्वरूप के निमित्त भी पूर्ण समर्थ हो सकें। “परेमणि-पर शब्दात्, भावे-इमनिच् प्रत्ययः” “पृथ्वादिभ्य इमनिज् वा” [अष्टा॰ ५.१.१२१]।
Essence
हे विक्रमशील परमात्मन्! संसार में फैले हुए तेरे सुनने योग्य विक्रम यश को अपने जीवन में धारणार्थ तुझे अपनाकर हम समर्थ होवें तथा तेरे पर—अभीष्ट मोक्षस्वरूप के निमित्त भी हम तेरे बने हुए पूर्ण समर्थ होवें यह हमारी आकांक्षा है॥६॥
Special
ऋषिः—वामदेवः (वननीय उपासनीय देव जिसका है)॥