Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 201

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣मा꣡ उ꣢ त्वा सु꣣ते꣡सु꣢ते꣣ न꣡क्ष꣢न्ते गिर्वणो꣣ गि꣡रः꣢ । गा꣡वो꣢ व꣣त्सं꣢꣫ न धे꣣न꣡वः꣢ ॥२०१॥

इ꣣माः꣢ । उ꣣ । त्वा । सुते꣡सु꣢ते । सु꣣ते꣢ । सु꣣ते । न꣡क्ष꣢꣯न्ते । गि꣣र्वणः । गिः । वनः । गि꣡रः꣢꣯ । गा꣡वः꣢꣯ । व꣣त्स꣢म् । न । धे꣣न꣡वः꣢ ॥२०१॥

Mantra without Swara
इमा उ त्वा सुतेसुते नक्षन्ते गिर्वणो गिरः । गावो वत्सं न धेनवः ॥

इमाः । उ । त्वा । सुतेसुते । सुते । सुते । नक्षन्ते । गिर्वणः । गिः । वनः । गिरः । गावः । वत्सम् । न । धेनवः ॥२०१॥

Samveda - Mantra Number : 201
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 9;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(गिर्वणः) हे स्तुतियों से वननीय सेवनीय परमात्मन्! (इमाः-गिरः) ये स्तुतियाँ (सुते सुते) प्रत्येक निष्पादित उपासनारस पर प्रत्येक उपासना प्रसङ्ग पर (त्वा-उ) तुझे ही (नक्षन्ते) प्राप्त होती हैं “नक्षति गतिकर्मा” [निघं॰ २.१४] ‘गतेरत्र प्राप्त्यर्थः’ (वत्सं न धेनवः-गावः) बछड़े के प्रति जैसे दुधारु गौवें प्राप्त होती हैं।
Essence
हे स्तुतियों से सम्भजनीय परमात्मन्! प्रत्येक निष्पन्न उपासनारस पर मेरी स्तुति वाणियाँ तेरे प्रति इस प्रकार प्राप्त हो रही हैं जैसे बछड़े के प्रति दुधारु गौवें प्राप्त होती हैं, उपमा यहाँ केवल प्राप्ति में उत्सुकता है॥८॥
Special
ऋषिः—भरद्वाजः (आत्मबल को भरण धारण करने वाला उपासक)॥