Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 200

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रो꣢ अ꣣ङ्ग꣢ म꣣ह꣢द्भ꣣य꣢म꣣भी꣡ षदप꣢꣯ चुच्यवत् । स꣢꣫ हि स्थि꣣रो꣡ विच꣢꣯र्षणिः ॥२००॥

इ꣡न्द्रः꣢꣯ । अ꣣ङ्ग꣢ । म꣣ह꣢त् । भ꣣य꣢म् । अ꣣भि꣢ । सत् । अ꣡प꣢꣯ । चु꣣च्यवत् । सः꣢ । हि । स्थि꣣रः꣢ । वि꣡च꣢꣯र्षणिः । वि । च꣣र्षणिः ॥२००॥

Mantra without Swara
इन्द्रो अङ्ग महद्भयमभी षदप चुच्यवत् । स हि स्थिरो विचर्षणिः ॥

इन्द्रः । अङ्ग । महत् । भयम् । अभि । सत् । अप । चुच्यवत् । सः । हि । स्थिरः । विचर्षणिः । वि । चर्षणिः ॥२००॥

Samveda - Mantra Number : 200
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 9;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्रः) परमात्मा (महत्-भयम्) भारीभय को (अङ्ग) शीघ्र “अङ्गेति क्षिप्रनाम” [निरु॰ ५.१७] (अभीषत्) अभिगत करता है तथा दबा देता है (अपचुच्यवत्) च्यवित कर देता है—नष्ट कर देता है, (सः-हि) वह ही (स्थिरः-विचर्षणिः) नितान्त विशेष द्रष्टा है।
Essence
परमात्मा अपने उपासक के भारी भय को भी शीघ्र दबाता है और सर्वथा नष्ट कर देता है, वह ही अपने उपासकों के दुर्गुणों और अन्य विघ्नकर्ताओं को नितान्त देखता, उपासक अपने ऊपर आए भय न जान सकें पर वह तो जानता है॥७॥
Special
ऋषिः—गृत्समदः (मेधावी हर्षालु या स्तोता और हर्षालु)॥