Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 19

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रयोगो भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣡मि꣢न्धा꣣नो꣡ मन꣢꣯सा꣣ धि꣡य꣢ꣳ सचेत꣣ म꣡र्त्यः꣢ । अ꣣ग्नि꣡मि꣢न्धे वि꣣व꣡स्व꣢भिः ॥१९॥

अ꣣ग्नि꣢म् । इ꣣न्धानः꣢ । म꣡न꣢꣯सा । धि꣡य꣢꣯म् स꣣चेत । म꣡र्त्यः꣢꣯ । अ꣣ग्नि꣢म् । इ꣣न्धे । वि꣣व꣡स्व꣢भिः । वि꣣ । व꣡स्व꣢भिः ॥१९॥

Mantra without Swara
अग्निमिन्धानो मनसा धियꣳ सचेत मर्त्यः । अग्निमिन्धे विवस्वभिः ॥

अग्निम् । इन्धानः । मनसा । धियम् सचेत । मर्त्यः । अग्निम् । इन्धे । विवस्वभिः । वि । वस्वभिः ॥१९॥

Samveda - Mantra Number : 19
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(मर्त्यः) मनुष्य (अग्निम्-इन्धानः) परमात्मरूप अग्नि को या ज्ञानप्रकाश स्वरूप परमात्मा को अपने अन्दर प्रकाशित—साक्षात् करने के हेतु (मनसा धियं सचेत) मन से परमात्म-चिन्तनरूप कर्म सेवे—करे “धीः कर्मनाम” [निघं॰ २.१] (विवस्वभिः-अग्निम्-इन्धे) कि मैं परिचर्याओं—“विवासति परिचरणकर्मा” [निघं॰ ३.५] निदिध्यासनरूप अभ्यासक्रियाओं के द्वारा परमात्मा को प्रकाशित करूँ—साक्षात् करूँ।
Essence
परमात्मा को अपने अन्दर प्रकाशित—साक्षात् करने के लिये मनुष्य श्रुतियों से परमात्मा के गुणों का श्रवण करके उन्हें जगत् की रचना में मन से मनन करे कि भिन्नभिन्न जीवशरीरों का गठन हाथी और ऊँट जैसे प्राणी को लम्बी सूँड और लम्बी ग्रीवा ऊपर नीचे से खाने को दे देना, भूतल पर ऊँचे स्थान से जलधाराओं को नीचे स्थानों में मार्ग बना बहाते हुए अत्यन्त निम्न स्थान समुद्र में पहुँचाकर भूपृष्ठ पर मनुष्य आदि के निवासार्थ भूभाग बनाना, आकाश में ग्रहतारों को अपनी अपनी गति से चलाने आदि से परमात्मगुणों का मनन कर पुनः आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधिरूप अभ्यास क्रियाओं से निदिध्यासन कर परमात्मा को अपने अन्दर प्रकाशित—साक्षात् करे। सो मैं उपासक ऐसा कर परमात्मा का साक्षात् करूँ॥९॥
Special
ऋषिः—भार्गवः प्रयोगः (अध्यात्म अग्नि प्रज्वलान में कुशल प्रयोग कर्ता उपासक)॥