Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 189

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
पा꣣वका꣢ नः꣣ स꣡र꣢स्वती꣣ वा꣡जे꣢भिर्वा꣣जि꣡नी꣢वती । य꣣ज्ञं꣡ व꣢ष्टु धि꣣या꣡व꣢सुः ॥१८९॥

पा꣣वका꣢ । नः꣣ । स꣡र꣢꣯स्वती । वा꣡जे꣢꣯भिः । वा꣣जि꣡नी꣢वती । य꣣ज्ञ꣢म् । व꣣ष्टु । धिया꣡व꣢सुः । धि꣣या꣢ । व꣣सुः ॥१८९॥

Mantra without Swara
पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । यज्ञं वष्टु धियावसुः ॥

पावका । नः । सरस्वती । वाजेभिः । वाजिनीवती । यज्ञम् । वष्टु । धियावसुः । धिया । वसुः ॥१८९॥

Samveda - Mantra Number : 189
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 8;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(सरस्वती) वाक्-स्तुति वाणी (वाजेभिः) विविध बलों से—शरीर मन आत्मबलों से “वाजः-बलम्” [निघं॰ २.९] (वाजिनीवती) बलवती प्रवृत्ति वाली होती हुई (नः पावकाः) हमें पवित्र करने वाली (धियावसुः-यज्ञं वष्टु) कर्म से वसी हुई कर्मपरायण क्रियाशील—प्रगति वाली होती हुई “धियावसुः कर्मवसुः” [निरु॰ ११.२६] “तृतीयायाः अलुक्” अध्यात्म यज्ञ को चाहे—सम्पन्न करे—बढ़ावे—चमकावें।
Essence
शरीर मन आत्मा के बलों की अपेक्षा स्तुति में होती है “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः” [मुण्ड॰ ३.२.४] इन तीनों बलों से स्तुति वाक् बलवती होकर हमें पवित्रकारिणी होती है वह ऐसी स्तुति वाणी प्रगतिशील कर्म प्रगति में बसी हुई अध्यात्म यज्ञ को चाहा या चमकाया करती है॥५॥
Special
ऋषिः—मधुच्छन्दाः (मीठी इच्छा वाला मधु अध्यात्म परायण जन)॥