Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 187

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣मा꣡स्त꣢ इन्द्र꣣ पृ꣡श्न꣢यो घृ꣣तं꣡ दु꣢हत आ꣣शि꣡र꣢म् । ए꣣ना꣢मृ꣣त꣡स्य पि꣣प्यु꣡षीः꣢ ॥१८७॥

इ꣣माः꣢ । ते꣣ । इन्द्र । पृ꣡श्न꣢꣯यः । घृ꣣त꣢म् । दु꣣हते । आशि꣡र꣢म् । आ꣣ । शिर꣢꣯म् । ए꣣ना꣢म् । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । पि꣣प्यु꣡षीः꣢ ॥१८७॥

Mantra without Swara
इमास्त इन्द्र पृश्नयो घृतं दुहत आशिरम् । एनामृतस्य पिप्युषीः ॥

इमाः । ते । इन्द्र । पृश्नयः । घृतम् । दुहते । आशिरम् । आ । शिरम् । एनाम् । ऋतस्य । पिप्युषीः ॥१८७॥

Samveda - Mantra Number : 187
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 8;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन्! (ते-इमाः-पृश्नयः) तेरे लिये अर्पित—तेरे लिये की हुई—मुझे स्पर्श करती हुई वाणियाँ स्तुतियाँ “वाग्वै पृश्निः” [काठ॰ ३४.१] (आशिरं घृतं दुहते) मेरे लिये तुझसे आश्रयणीय “आशीराश्रयणात्” [निरु॰ ६.८] ज्ञानमय तेज—ज्ञानामृत को “तेजो वै घृतम्” [मै॰ १.६.८] “घृतं.......अमृतम्” [मै॰ ४.१२.४] “घृ दीप्तौ” [जुहो॰] दुहती है—मेरे अन्दर भर देती हैं (एनाम्-ऋतस्य पिप्युषीः) ‘एनाम्-एनाः’ ‘विभक्तिवचनव्यत्ययः’ ये स्तुतियाँ अध्यात्म यज्ञ की बढ़ाने वाली हैं ‘पिप्युषीः’ प्रथमार्थे द्वितीया-‘विभक्तिव्यत्ययः’।
Essence
परमात्मन्! तेरे लिये समर्पित ये स्तुतियाँ मेरे लिये तुझसे आश्रयणीय ज्ञानमय तेज या तेजोमय अमृत को दूहती हैं जो मेरा अमर सहारा है, वस्तुतः ये स्तुतियाँ अध्यात्म यज्ञ को आगे-आगे बढ़ाती रहती हैं॥३॥
Special
ऋषिः—वत्सः (वक्ता—प्रार्थना वचन-कर्ता)॥