Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 186

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ग꣣व्यो꣢꣫ षु णो꣣ य꣡था꣢ पु꣣रा꣢श्व꣣यो꣡त र꣢꣯थ꣣या꣢ । व꣣रिवस्या꣢ म꣣हो꣡ना꣢म् ॥१८६॥

ग꣣व्य꣢ । उ꣣ । सु꣢ । नः꣣ । य꣡था꣢꣯ । पु꣣रा꣢ । अ꣣श्वया꣢ । उ꣣त꣢ । र꣣थया꣢ । व꣣रिवस्या꣢ । म꣣हो꣡ना꣢म् ॥१८६॥

Mantra without Swara
गव्यो षु णो यथा पुराश्वयोत रथया । वरिवस्या महोनाम् ॥

गव्य । उ । सु । नः । यथा । पुरा । अश्वया । उत । रथया । वरिवस्या । महोनाम् ॥१८६॥

Samveda - Mantra Number : 186
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 8;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(उ सु) अरे मानव! अपने कल्याणार्थ (गव्या) ‘गव्यया’ प्रशस्तवाणी की इच्छा से—वाणी परमात्मा की स्तुति करने वाली वाणी प्राप्त हो (अश्वया) सब विषय व्यापक प्रशस्त मन की इच्छा से—मन परमात्मा का चिन्तन करने वाला हो (उत) और (रथया) प्रशस्त शरीर रथ की इच्छा से—सदाचरण करने वाला संयमी स्वस्थ रहें (महोनाम्) महान्—श्रेष्ठों में श्रेष्ठ इन्द्र ऐश्वर्यवन् इष्टदेव परमात्मन्! ‘निर्धारणे षष्ठी’ तू (नः) हमें (यथा-पुरा) पूर्व की भाँति—पूर्वजन्म की भाँति—पूर्वजन्म में ये दिये थे ऐसे देकर (वरिवस्य) अपनी परिचर्या में बना पुनः पूर्व की भाँति मोक्ष का आनन्द भुगा।
Essence
सर्वमहान् परमात्मन्! हमें पूर्वजन्म की भाँति जिस पूर्वजन्म में उत्तम वाणी स्तुति करने वाली उत्तम मन तेरा चिन्तन करने वाला, उत्तम शरीर तेरी प्राप्ति के सदाचरण करने वाला पाकर पूर्व मोक्षानन्द को कभी प्राप्त किया था उसे पुनः प्राप्त कर सकूँ ऐसे इन वाणी आदियों को देकर अपनी परिचर्या उपासना हमसे करवा पुनः मोक्षानन्द को भुगा॥२॥
Special
ऋषिः—वत्सः (वक्ता—निवेदयिता प्रार्थी)॥