Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 184

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- उलो वातायनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
वा꣢त꣣ आ꣡ वा꣢तु भेष꣣ज꣢ꣳ श꣣म्भु꣡ म꣢यो꣣भु꣡ नो꣢ हृ꣣दे꣢ । प्र꣢ न꣣ आ꣡यू꣢ꣳषि तारिषत् ॥१८४॥

वा꣡तः꣢꣯ । आ । वा꣢तु । भेषज꣢म् । शं꣣म्भु꣢ । श꣣म् । भु꣢ । म꣣योभु꣢ । म꣣यः । भु꣢ । नः꣣ । हृदे꣢ । प्र । नः꣣ । आ꣡यूँ꣢꣯षि । ता꣣रिषत् ॥१८४॥

Mantra without Swara
वात आ वातु भेषजꣳ शम्भु मयोभु नो हृदे । प्र न आयूꣳषि तारिषत् ॥

वातः । आ । वातु । भेषजम् । शंम्भु । शम् । भु । मयोभु । मयः । भु । नः । हृदे । प्र । नः । आयूँषि । तारिषत् ॥१८४॥

Samveda - Mantra Number : 184
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 7;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(वातः) ‘वाति सर्वत्र विभुगत्या प्राप्तो भवतीति वातः-स एव-इन्द्रः परमात्मा’ सर्वत्र विभुगति से प्राप्त परमात्मा ‘वातः प्राणस्तदयमात्मा’ [काठ॰ ७.१४] (नः) हमारे (हृदे) हृदय के लिये (शम्भु मयोभु भेषजम्) अध्यात्म कल्याण भावित करने वाले लौकिक सुख भावित करने वाले अमृत-स्वरूप को “यद् भेषजं तदमृतम्” [गो॰ १.३.४] (आ वातु) सञ्चारित करें (नः-आयूंषि प्रतारिषत्) हमारी आयुओं को—प्राणों को “आयुः प्राणः” [तै॰ ३.३.४.३] बढ़ावें।
Essence
वातस्वरूप इन्द्र परमात्मा हमारे हृदय के लिये अन्तःकरण के लिए शान्ति भावित करने वाले तथा सुख भावित करने वाले अपने अमृतस्वरूप को सञ्चारित करें—करता है, जब कोई उसका बन जाता है उसमें रत हो जाता है तथा उसके भौतिक प्राणों को भी बढ़ाता है—मुक्ति में रहने वाले अमृत प्राणों को भी प्रदान करता है॥१०॥
Special
ऋषिः—वातायन उल्लः (सुन्दर अध्यात्म वातावरण अयन आश्रय में विराजमान उल्लास को प्राप्त उपासक जन)॥