Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 1837

1875 Mantra
Devata- आपः Rishi- त्रिशिरास्त्वाष्ट्रः सिन्धुद्वीप आम्बरीषो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣢पो꣣ हि꣡ ष्ठा म꣢꣯यो꣣भु꣢व꣣स्ता꣡ न꣢ ऊ꣣र्जे꣡ द꣢धातन । म꣣हे꣡ रणा꣢꣯य꣣ च꣡क्ष꣢से ॥१८३७॥

आ꣡पः꣢꣯ । हि । स्थ । म꣣योभु꣡वः꣢ । म꣣यः । भु꣡वः꣢꣯ । ताः । नः꣣ । ऊर्जे꣢ । द꣣धातन । दधात । न । महे꣢ । र꣡णा꣢꣯य । च꣡क्ष꣢꣯से ॥१८३७॥

Mantra without Swara
आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन । महे रणाय चक्षसे ॥

आपः । हि । स्थ । मयोभुवः । मयः । भुवः । ताः । नः । ऊर्जे । दधातन । दधात । न । महे । रणाय । चक्षसे ॥१८३७॥

Samveda - Mantra Number : 1837
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 7;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(आपः) हे आप्तव्य—प्राप्त करने योग्य परमात्मन्!६ तू (मयः-भुवः-हि स्थ) सुख७ भावित करनेवाला निश्चय है (ताः-नः) वह तू हमें (ऊर्जे) मोक्षानन्दरस के लिये८ (महे रणाय चक्षसे) महान् रमणीय अपने दर्शन के लिये९ (दधातन) धारण करा॥१॥
Special
ऋषिः—त्रिशिरः सिन्धुद्वीपः (तीन ज्ञान श्री५ वेदत्रयी वाला स्यन्दमान दो प्रवाहों—संसार और मोक्ष में वर्तमान उपासक)॥ देवता—आपः (आप्तव्य परमात्मा)॥ छन्दः—गायत्री॥