Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 182

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ओ꣢ज꣣स्त꣡द꣢स्य तित्विष उ꣣भे꣢꣫ यत्स꣣म꣡व꣢र्तयत् । इ꣢न्द्र꣣श्च꣡र्मे꣢व꣣ रो꣡द꣣सी ॥१८२॥

ओ꣡जः꣢꣯ । तत् । अ꣣स्य । तित्विषे । उभे꣡इ꣢ति । यत् । स꣣म꣡व꣢र्तयत् । स꣣म् । अ꣡व꣢꣯र्तयत् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । च꣡र्म꣢꣯ । इ꣣व । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ ॥१८२॥

Mantra without Swara
ओजस्तदस्य तित्विष उभे यत्समवर्तयत् । इन्द्रश्चर्मेव रोदसी ॥

ओजः । तत् । अस्य । तित्विषे । उभेइति । यत् । समवर्तयत् । सम् । अवर्तयत् । इन्द्रः । चर्म । इव । रोदसीइति ॥१८२॥

Samveda - Mantra Number : 182
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 7;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अस्य) इन्द्र परमात्मा का (तत्-ओजः-तित्विषे) वह ओज स्वात्मीय बल प्रदीप्त हो रहा है (यत्-इन्द्रः-उभे रोदसी) यतः-जिससे ऐश्वर्यवान् परमात्मा दोनों द्यावापृथिवी—द्युलोक और पृथिवी लोक को द्यावापृथिवीमयी सृष्टि को “रोदसी पृथिवीनाम” [निघं॰ ३.३०] ऐसे संवृत कर लेता है, ढक लेता है (चर्म-इव समवर्तयत्) जैसे कोई शिल्पी ऊपर चमड़ा चढ़ा कर वस्तु को उसकी रक्षार्थ ढक देता है। संवृत कर लेता है, ढक लेता है।
Essence
परमात्मा का स्वात्मीय बल प्रकाशित होकर सारी द्युलोक पृथिवीलोकमयी सृष्टि को ढक रहा है चमड़े की भाँति अर्थात् परमात्मा का स्वात्मबल प्रत्येक वस्तु में प्रकाशित है जो प्रत्येक वस्तु को उसके अपने स्वरूप में बनाए रखता है, वह प्रत्येक वस्तु की रक्षा भी करता है और प्रत्येक वस्तु के स्वरूप को भी निरूपित करता है॥८॥
Special
ऋषिः—वत्सः (परमात्मगुणों का वक्ता)॥