Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 174

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- बिन्दुः पूतदक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣢स्ति꣣ सो꣡मो꣢ अ꣣य꣢ꣳ सु꣣तः꣡ पि꣢꣯बन्त्यस्य म꣣रु꣡तः꣢ । उ꣣त꣢ स्व꣣रा꣡जो꣢ अ꣣श्वि꣡ना꣢ ॥१७४॥

अ꣡स्ति꣢꣯ । सो꣡मः꣢꣯ । अ꣣य꣢म् । सु꣣तः꣢ । पि꣡ब꣢꣯न्ति । अ꣣स्य । मरु꣡तः꣢ । उ꣣त꣢ । स्व꣣रा꣡जः꣢ । स्व꣣ । रा꣡जः꣢꣯ । अ꣣श्वि꣡ना꣢ ॥१७४॥

Mantra without Swara
अस्ति सोमो अयꣳ सुतः पिबन्त्यस्य मरुतः । उत स्वराजो अश्विना ॥

अस्ति । सोमः । अयम् । सुतः । पिबन्ति । अस्य । मरुतः । उत । स्वराजः । स्व । राजः । अश्विना ॥१७४॥

Samveda - Mantra Number : 174
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अयं सोमः-सुतः-अस्ति) हे इन्द्र ऐश्वर्यवन् परमात्मन्! यह उपासनारस निष्पन्न किया है तू इसे पान कर यह निकृष्ट रस नहीं (उत) अपितु (अस्य) “इमम्-विभक्तिव्यत्ययः” इसको (स्वराजः-अश्विना ‘अश्विनः’ मरुतः पिबन्ति) अपनी शक्ति से राजमान मेरे शरीर में व्यापनशील “व्यश्नुवते-अश्विनः” [निरु॰ १२.१] प्राण भी पीते हैं—इसका पान करते हैं जो अपने प्राणों के लिये प्रिय है वह निकृष्ट नहीं वह तो प्राणों के भी तुझ प्राण को भेंट है। “प्राणो वै मरुतः स्वापयः” [ऐ॰ ३.१६] “अश्विनः स्थाने ‘अश्विना’ इत्याकारादेशः”।
Essence
परमात्मन्! उपासनारस तेरी भेंट है तू इसे पान कर यह निकृष्ट भेंट नहीं अपितु उत्कृष्ट है मेरे प्राण इस पान को प्रथम पीते है जो कि मेरे साथ शरीर में राजमान और व्यापने वाले हैं, प्राणों से प्यारा कोई नहीं यह लौकिक उक्ति है, परन्तु तू प्राणों से भी प्यारा है इसलिय यह उपासना रस तेरी भेंट है॥१०॥
Footnote
[*16. “विदि अवयवे” [भ्वादि॰]]
Special
ऋषिः—बिन्दुः (स्व वासनाओं को छिन्न-भिन्न करने वाला*16)॥