Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 170

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त्य꣡मु꣢ वः सत्रा꣣साहं꣣ वि꣡श्वा꣢सु गी꣣र्ष्वा꣡य꣢तम् । आ꣡ च्या꣢वयस्यू꣣त꣡ये꣢ ॥१७०॥

त्य꣢म् । उ꣣ । वः । सत्रासा꣡ह꣢म् । स꣣त्रा । सा꣡ह꣢꣯म् । वि꣡श्वा꣢꣯सु । गी꣣र्षु꣢ । आ꣡य꣢꣯तम् । आ । य꣣तम् । आ꣢ । च्या꣣वयसि । ऊत꣡ये꣢ ॥१७०॥

Mantra without Swara
त्यमु वः सत्रासाहं विश्वासु गीर्ष्वायतम् । आ च्यावयस्यूतये ॥

त्यम् । उ । वः । सत्रासाहम् । सत्रा । साहम् । विश्वासु । गीर्षु । आयतम् । आ । यतम् । आ । च्यावयसि । ऊतये ॥१७०॥

Samveda - Mantra Number : 170
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(विश्वासु गीर्षु) समस्त स्तुतियों में (आयतम्) व्याप्त—(सत्रासाहम्) सत्य—अविनाशी एवं सत्यरूप से सब पर अभिभूत “सत्रा सत्यनाम” [निघं॰ ३.१०] (त्यम्-उ) उसी इष्टदेव ऐश्वर्यवान् परमात्मा को (वः) “त्वम्-विभक्ति वचनव्यत्ययः” तू (ऊतये) रक्षा के लिये (आच्यावयसि) स्तुतियों से अपनी ओर झुका लेता है।
Essence
सत्य से सब पर अधिकारकर्ता परमात्मा को अपनी रक्षार्थ उपासक स्तुतियों से अपनी ओर झुका लेता है क्योंकि समस्त स्तुतियों में वह परमात्मा व्याप्त है प्रत्येक स्तुति का सत्पात्र है प्रत्येक स्तुति को स्वीकार करता है॥६॥
Special
ऋषिः—श्रुतकक्षः (सुन लिया है अध्यात्मकक्ष जिसने ऐसा जन)॥