Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 169

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
क꣡या꣢ नश्चि꣣त्र꣡ आ भु꣢꣯वदू꣣ती꣢ स꣣दा꣡वृ꣢धः꣣ स꣡खा꣢ । क꣢या꣣ श꣡चि꣢ष्ठया वृ꣣ता꣢ ॥१६९॥

क꣡या꣢꣯ । नः꣣ । चित्रः꣢ । आ । भु꣣वत् । ऊती꣢ । स꣣दा꣡वृ꣢धः । स꣣दा꣢ । वृ꣣धः । स꣣खा꣢꣯ । स । खा꣣ । क꣡या꣢꣯ । श꣡चि꣢꣯ष्ठया । वृ꣣ता꣢ ॥१६९॥

Mantra without Swara
कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा । कया शचिष्ठया वृता ॥

कया । नः । चित्रः । आ । भुवत् । ऊती । सदावृधः । सदा । वृधः । सखा । स । खा । कया । शचिष्ठया । वृता ॥१६९॥

Samveda - Mantra Number : 169
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(कया-ऊती) किसी भी स्तुति प्रवृत्ति से (कया शचिष्ठया वृता) किसी भी अत्युत्तम प्रज्ञा—आत्मभावनामय वृत्ति से (नः) हमारा (सदावृधः सखा) सदावर्धक उत्कर्ष करने वाला मित्र वह परमात्मा (आभुवत्) हो जाता है।
Essence
परमात्मा की कृपा अपार है वह हमारी किसी भी ऊँची स्तुति से या किसी ऊँची श्रद्धामय आत्मभावना वैराग्य प्रवृत्ति से सदा उत्कर्ष करने वाला मित्र बन जाता है। अतः हमें उसकी स्तुति और अनुरागभरी श्रद्धा आत्मभावना से अर्पित करनी चाहिए॥५॥
Special
ऋषिः—वामदेवः (वननीय वन्दनीय देव—इष्टदेव जिसका है ऐसा उपासक जन)॥