Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 168

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रियमेधः आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣भि꣡ प्र गोप꣢꣯तिं गि꣣रे꣡न्द्र꣢मर्च꣣ य꣡था꣢ वि꣣दे꣢ । सू꣣नु꣢ꣳ स꣣त्य꣢स्य꣣ स꣡त्प꣢तिम् ॥१६८॥

अ꣣भि꣢ । प्र । गो꣡प꣢꣯तिम् । गो꣢ । प꣣तिम् । गिरा꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । अ꣣र्च । य꣡था꣢꣯ । वि꣣दे꣢ । सू꣣नु꣢म् । स꣣त्य꣡स्य꣣ । स꣡त्प꣢꣯तिम् । सत् । प꣣तिम् ॥१६८॥

Mantra without Swara
अभि प्र गोपतिं गिरेन्द्रमर्च यथा विदे । सूनुꣳ सत्यस्य सत्पतिम् ॥

अभि । प्र । गोपतिम् । गो । पतिम् । गिरा । इन्द्रम् । अर्च । यथा । विदे । सूनुम् । सत्यस्य । सत्पतिम् । सत् । पतिम् ॥१६८॥

Samveda - Mantra Number : 168
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(यथाविदे) हे उपासक तू यथावत् वेत्ता होने के लिये (गोपतिम्) वेदवाणी के स्वामी—(सत्पतिम्) सत्पुरुषों—उपासकों के पालक (सत्यस्य-सूनुम्) सत्य के प्रेरक (इन्द्रम्) ऐश्वर्यवान् परमात्मा को (अभि) पुनः पुनः उसे (गिरा प्रार्च) स्तुति से अर्चित कर।
Essence
मानव तू यथार्थवेत्ता होने के लिये वेदवाणी के स्वामी, उपासकों के पालक, सत्य के प्रेरक परमात्मा की स्तुति से पुनः पुनः या निरन्तर अर्चना किया कर॥४॥
Special
ऋषिः—प्रियमेधः (प्रिय है मेधा जिसकी ऐसा जन)॥