Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 1674

1875 Mantra
Devata- विष्णुर्देवो वा Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡तो꣢ दे꣣वा꣡ अ꣢वन्तु नो꣣ य꣢तो꣣ वि꣡ष्णु꣢र्विचक्र꣣मे꣢ । पृ꣣थिव्या꣢꣫ अधि꣣ सा꣡न꣢वि ॥१६७४॥

अ꣡तः꣣ । दे꣣वाः꣢ । अ꣣वन्तु । नः । य꣡तः꣢꣯ । वि꣡ष्णुः꣢꣯ । वि꣣चक्रमे꣢ । वि꣣ । चक्रमे꣢ । पृ꣣थिव्याः꣢ । अ꣡धि꣢꣯ । सा꣡न꣢꣯वि ॥१६७४॥

Mantra without Swara
अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे । पृथिव्या अधि सानवि ॥

अतः । देवाः । अवन्तु । नः । यतः । विष्णुः । विचक्रमे । वि । चक्रमे । पृथिव्याः । अधि । सानवि ॥१६७४॥

Samveda - Mantra Number : 1674
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(पृथिव्याः-अधि सानवि) पृथिवीलोक से लेकर ऊपर द्युलोक तक में (यतः-विष्णुः-विचक्रमे) जिससे कि व्यापक परमात्मा ने अपनी व्याप्तिरूप विक्रम क्रिया है (अतः) इससे वह परमात्मा सर्वत्र है (देवाः-नः-अवन्तु) जीवन्मुक्त आत्माएँ हमें उस व्यापक परमात्मा का श्रवण एवं बोध करावे६॥६॥
Special