Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 1662

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡रं꣢ त इन्द्र कु꣣क्ष꣢ये꣣ सो꣡मो꣢ भवतु वृत्रहन् । अ꣢रं꣣ धा꣡म꣢भ्य꣣ इ꣡न्द꣢वः ॥१६६२॥

अ꣡र꣢꣯म् । ते꣣ । इन्द्र । कु꣡क्षये꣢ । सो꣡मः꣢꣯ । भ꣣वतु । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । अ꣡र꣢꣯म् । धा꣡म꣢꣯भ्यः । इ꣡न्द꣢꣯वः ॥१६६२॥

Mantra without Swara
अरं त इन्द्र कुक्षये सोमो भवतु वृत्रहन् । अरं धामभ्य इन्दवः ॥

अरम् । ते । इन्द्र । कुक्षये । सोमः । भवतु । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । अरम् । धामभ्यः । इन्दवः ॥१६६२॥

Samveda - Mantra Number : 1662
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(वृत्रहन्-इन्द्र) हे पापनाशक ऐश्वर्यवन्६ परमात्मन्! (ते-कुक्षये) तेरे कोख-जठर-मध्य में समाने के लिये उपासक का (सोमः) उपासनारस (अरं भवतु) ‘अलम्’ पर्याप्त या बहुत होवे, उपासक अपनी अल्प शक्ति के अनुसार उपासनारस प्रस्तुत कर सकेगा, तू अनन्त है अतः तेरा कुक्षि या जठर-मध्य अवकाश भरा नहीं जा सकता, एवं (इन्दवः) निरन्तर असंख्य धाराप्रवाह से आर्द्र उपासनारस (धामभ्यः-अरम्) तेरे व्यापनशील अङ्गों७ उपासक के अन्दर वर्तमान तेरे कृपांशों के लिये बहुत या पर्याप्त हो॥३॥
Special