Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 1661

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वि꣣व्य꣡क्थ꣢ महि꣣ना꣡ वृ꣢षन्भ꣣क्ष꣡ꣳ सोम꣢꣯स्य जागृवे । य꣡ इ꣢न्द्र ज꣣ठ꣡रे꣢षु ते ॥१६६१॥

वि꣣व्य꣡क्थ꣢ । म꣣हिना꣢ । वृ꣣षन् । भक्ष꣢म् । सो꣡म꣢꣯स्य । जा꣣गृवे । यः꣢ । इ꣣न्द्र । जठ꣡रे꣢षु । ते꣣ ॥१६६१॥

Mantra without Swara
विव्यक्थ महिना वृषन्भक्षꣳ सोमस्य जागृवे । य इन्द्र जठरेषु ते ॥

विव्यक्थ । महिना । वृषन् । भक्षम् । सोमस्य । जागृवे । यः । इन्द्र । जठरेषु । ते ॥१६६१॥

Samveda - Mantra Number : 1661
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(वृषन्-जागृवे-इन्द्र) हे सुखवर्षक जीवों के कर्मफल प्रदान में न्याय करने में निरन्तर जागरूक सावधान ऐश्वर्यवन् परमात्मन्! तू (महिना) अपनी महती कृपा से (सोमस्य भक्षं विव्यक्थ) उपासक के द्वारा समर्थित उपासनारस के खान-पान को निमित्त बनाता है४ अपना समागम आनन्द प्रदान करने को (यः-ते जठरेषु) जो उपासनारस तेरे मध्य में५ कृपा प्रसाद बन बैठ जाता है॥२॥
Special