Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 165

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣द꣡ꣳ ह्यन्वोज꣢꣯सा सु꣣त꣡ꣳ रा꣢धानां पते । पि꣢बा꣣ त्वा꣣३꣱स्य꣡ गि꣢र्वणः ॥१६५॥

इ꣣द꣢म् । हि । अ꣡नु꣢꣯ । ओ꣡ज꣢꣯सा । सु꣣त꣢म् । रा꣣धानाम् । पते । पि꣡ब꣢꣯ । तु । अ꣣स्य꣢ । गि꣢र्वणः । गिः । वनः । ॥१६५॥

Mantra without Swara
इदꣳ ह्यन्वोजसा सुतꣳ राधानां पते । पिबा त्वा३स्य गिर्वणः ॥

इदम् । हि । अनु । ओजसा । सुतम् । राधानाम् । पते । पिब । तु । अस्य । गिर्वणः । गिः । वनः । ॥१६५॥

Samveda - Mantra Number : 165
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(गिर्वणः-राधानां पते) हे स्तुति वचनों से वननीय सेवनीय तथा हमारी समस्त आराधनाओं के पालक—किसी भी आराधना को व्यर्थ न जाने देने वाले परमात्मन्! (अनु-ओजसा हि सुतम्-इदम्) अनुक्रमपूर्वक—श्रवण मनन कर पुनः निदिध्यासन बल से उपासनारस को निष्पन्न किया है (अस्य तु पिब) इसका अवश्य पान कर—इसे स्वीकार कर।
Essence
परमात्मन्! तू उपासक की समस्त आराधनाओं का पालन स्वागत करता है, किसी की भी उपेक्षा नहीं करता है, व्यर्थ नहीं जाने देता है, और स्तुति द्वारा हमारा वननीय सेवनीय है, हम तुझे स्तुति से ही सेवन कर सकते हैं, अन्य भौतिक वस्तुएँ तो तेरी दी हुई हैं, उनकी तुझे क्या भेंट देनी, तुझे उनकी आवश्यकता भी नहीं, अतः जो हमने श्रवण, मनन, पुनः निदिध्यासनरूप पूर्ण प्रयत्न बल से उपासनारस सम्पन्न किया है, उसे अवश्य पान कर—स्वीकार कर, ऐसी प्रार्थना है॥१॥
Special
ऋषिः—विश्वामित्रः (सबको मित्र माननेवाला जन)॥