Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 1625

1875 Mantra
Devata- विष्णुः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
कि꣡मित्ते꣢꣯ विष्णो परि꣣च꣢क्षि꣣ ना꣢म꣣ प्र꣡ यद्व꣢꣯व꣣क्षे꣡ शि꣢पिवि꣣ष्टो꣡ अ꣢स्मि । मा꣡ वर्पो꣢꣯ अ꣣स्म꣡दप꣢꣯ गूह ए꣣त꣢꣫द्यद꣣न्य꣡रू꣢पः समि꣣थे꣢ ब꣣भू꣡थ꣢ ॥१६२५॥

कि꣢म् । इत् । ते꣣ । विष्णो । परिच꣡क्षि꣢ । प꣣रि । च꣡क्षि꣢꣯ । ना꣡म꣢꣯ । प्र । यत् । व꣡वक्षे꣢꣯ । शि꣡पिविष्टः꣢ । शि꣢पि । विष्टः꣢ । अ꣣स्मि । मा꣡ । व꣡र्पः꣢꣯ । अ꣣स्म꣢त् । अ꣡प꣢꣯ । गू꣣हः । एत꣢त् । यत् । अ꣣न्य꣡रू꣢पः । अ꣣न्य꣢ । रू꣣पः । समिथे꣢ । स꣣म् । इथे꣢ । ब꣣भू꣡थ꣢ ॥१६२५॥

Mantra without Swara
किमित्ते विष्णो परिचक्षि नाम प्र यद्ववक्षे शिपिविष्टो अस्मि । मा वर्पो अस्मदप गूह एतद्यदन्यरूपः समिथे बभूथ ॥

किम् । इत् । ते । विष्णो । परिचक्षि । परि । चक्षि । नाम । प्र । यत् । ववक्षे । शिपिविष्टः । शिपि । विष्टः । अस्मि । मा । वर्पः । अस्मत् । अप । गूहः । एतत् । यत् । अन्यरूपः । अन्य । रूपः । समिथे । सम् । इथे । बभूथ ॥१६२५॥

Samveda - Mantra Number : 1625
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(विष्णो) हे व्यापक परमात्मन्! (किम्-इत् ते परि चक्षि नाम) क्या ही तेरा व्याख्या करने योग्य नाम है जो लोक-लोकान्तरों में व्याप्त छिपा हुआ है, जबकि (यद्-शिपिविष्टः-अस्मि प्रववक्षे) ज्ञानरश्मियों१ से विष्ट—आविष्ट—भरपूर हूँ ऐसा कहना उपासकों के प्रति ध्यान में आकर (अस्मत्) हम उपासकों से (वर्पः-मा-अपगूह) अपने रूप२ को मत छिपा—नहीं छिपाता है, अन्यों—साधारण जनों के सामने तेरा रूप छिपा रहता है वे तुझे स्थूल दृष्टि से देखते हैं लोकों में मात्र व्यापक है—छिपा हुआ है ऐसा ही मानते हैं (एतत्-यत्-अन्यरूपः) यह जो अन्यरूप वाला—ज्ञानदृष्टि वाला (समिथे बभूथ) अभ्यास वैराग्य द्वारा वृत्तिनिरोध संग्राम में—विजय पर तू साक्षात् हो जाता है॥१॥
Special
ऋषिः—वसिष्ठः (परमात्मा में अत्यन्त वसने वाला उपासक)॥ देवता—विष्णुः (व्यापक परमात्मा)॥