Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 161

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣भि꣡ त्वा꣢ वृषभा सु꣣ते꣢ सु꣣त꣡ꣳ सृ꣢जामि पी꣣त꣡ये꣢ । तृ꣣म्पा꣡ व्य꣢श्नुही꣣ म꣡द꣢म् ॥१६१॥

अ꣣भि꣢ । त्वा꣣ । वृषभ । सुते꣢ । सु꣣त꣢म् । सृ꣣जामि । पीत꣡ये꣢ । तृ꣣म्प꣢ । वि । अ꣣श्नुहि । म꣡द꣢꣯म् ॥१६१॥

Mantra without Swara
अभि त्वा वृषभा सुते सुतꣳ सृजामि पीतये । तृम्पा व्यश्नुही मदम् ॥

अभि । त्वा । वृषभ । सुते । सुतम् । सृजामि । पीतये । तृम्प । वि । अश्नुहि । मदम् ॥१६१॥

Samveda - Mantra Number : 161
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(वृषभ) हे सुखों की वर्षा करने वाले परमात्मन्! (सुते) उपासनारस निष्पन्न होने पर (पीतये) पान करने—स्वीकार करने के लिये (सुतम्) निष्पन्न उपासनारस को (त्वा) तेरे प्रति (अभिसृजामि) भेंट करता हूँ (तृम्प) मुझे तृप्त कर (मदं व्यश्नुहि) हर्ष—आनन्द को मुझे प्राप्त करा।
Essence
सुखों की वृष्टि करने वाले परमात्मन्! उपासनानिष्पन्न रस को स्वीकार करने के लिये तेरे प्रति भेंट करता हूँ निःसन्देह तू भी मुझे तृप्त करता है अपना आनन्द प्राप्त कराता है॥७॥
Special
ऋषिः—त्रिशोकः (तीन प्रकार की ज्ञानदीप्ति वाला—विद्यात्रयी ज्ञान वाला)॥