Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 154

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः, वामदेवो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
सो꣡मः꣢ पू꣣षा꣡ च꣢ चेततु꣣र्वि꣡श्वा꣢साꣳ सुक्षिती꣣ना꣢म् । दे꣣वत्रा꣢ र꣣꣬थ्यो꣢꣯र्हि꣣ता꣢ ॥१५४

सो꣡मः꣢꣯ । पू꣣षा꣢ । च꣣ । चेततुः । वि꣡श्वा꣢꣯साम् । सु꣣क्षितीना꣢म् । सु꣣ । क्षितीना꣢म् । दे꣣वत्रा꣢ । र꣣थ्योः꣢꣯ । हि꣣ता꣢ ॥१५४॥

Mantra without Swara
सोमः पूषा च चेततुर्विश्वासाꣳ सुक्षितीनाम् । देवत्रा रथ्योर्हिता ॥१५४

सोमः । पूषा । च । चेततुः । विश्वासाम् । सुक्षितीनाम् । सु । क्षितीनाम् । देवत्रा । रथ्योः । हिता ॥१५४॥

Samveda - Mantra Number : 154
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(विश्वासां-सुक्षितीनाम्) सारी सुन्दर भूमिवाली नसनाड़ियो में वर्तमान (सोमः पूषा च हिता) जीवनरस और पोषणकर्ता प्राण वायु को “रसः सोमः” [श॰ ७.३.१.३] “अयं वै पूषा योऽयं पवते, एष, हि सर्वं पुष्यति” [श॰ १४.२.१.९] शरीर में रहने वाले (देवत्रा) देवों की ओर जाने वाले (रथ्योः-चेततुः) ज्ञान मार्ग और कर्म मार्ग को सुप्रसिद्ध करते हैं।
Essence
पूर्वोक्त इन्द्रिय वासनाओं को परमात्मा की ओर झुका दें तो जब इन्द्रियों की प्रवृत्तियाँ भोग के साथ परमात्मा की ओर झुकी हुई होती है तो शरीर की समस्त नाड़ियों में जीवनरस और प्राण वायु ये दोनों शरीर में रहते हुए मानव को देवों—उत्कृष्ट मानवों मुमुक्षु और जीवन्मुक्त दशा की ओर जाने वाले ज्ञान मार्ग और कर्म मार्ग को सुप्रसिद्ध करते हैं॥१०॥
Special
ऋषिः—शुनः शेप आजीगर्त्तः (विषय लोलुप हो इन्द्रिय भोगों की दौड़ में शरीरगर्त में आया हुआ आत्मकल्याण का इच्छुक जन)॥