Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 153

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शुनः शेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
रे꣣व꣡ती꣢र्नः सध꣣मा꣢द꣣ इ꣡न्द्रे꣢ सन्तु तु꣣वि꣡वा꣢जाः । क्षु꣣म꣢न्तो꣣ या꣢भि꣣र्म꣡दे꣢म ॥१५३॥

रे꣣व꣡तीः꣢ । नः꣣ । सधमा꣡दे꣢ । स꣣ध । मा꣡दे꣢꣯ । इ꣡न्द्रे꣢꣯ । स꣣न्तु । तुवि꣡वा꣢जाः । तु꣣वि꣢ । वा꣣जाः । क्षुम꣡न्तः꣢ । या꣡भिः꣢꣯ । म꣡दे꣢꣯म ॥१५३॥

Mantra without Swara
रेवतीर्नः सधमाद इन्द्रे सन्तु तुविवाजाः । क्षुमन्तो याभिर्मदेम ॥

रेवतीः । नः । सधमादे । सध । मादे । इन्द्रे । सन्तु । तुविवाजाः । तुवि । वाजाः । क्षुमन्तः । याभिः । मदेम ॥१५३॥

Samveda - Mantra Number : 153
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(नः) हमारी (रेवतीः) प्रशस्त भोगैश्वर्य वाली इन्द्रियाँ—इन्द्रियवासनाएँ (सधमादे-इन्द्रे) माद—आनन्द साथ जिसके है उस स्वभावतः आनन्दस्वरूप परमात्मा में (तुविवाजाः सन्तु) बहुत सुखमय लोक वाली हो जावें “वाजो वै स्वर्गो लोकः” [ता॰ १८.७] (याभिः) जिनके द्वारा (क्षुमन्तः-मदेम) उत्तम अन्न भोग वाले हम हो सकें।
Essence
हमारी इन्द्रियाँ अपने अपने विषयों का सेवन करती हुईं यदि परमात्मा में लग जायें तो इनका भोग प्रशस्त हो जावे, इस प्रकार परमात्मा के साथ उत्कृष्ट भोग वाली हो जाती हैं॥९॥
Special
ऋषिः—शुनःशेप आजीगर्त्तः (विषय लोलुप हो इन्द्रिय भोगों की दौड़ में शरीरगर्त में आया हुआ आत्मकल्याण का इच्छुक जन)॥