Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 152

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣ह꣢꣫मिद्धि पि꣣तु꣡ष्परि꣢ मे꣣धा꣢मृ꣣त꣡स्य꣢ ज꣣ग्र꣡ह꣢ । अ꣣ह꣡ꣳ सूर्य꣢꣯ इवाजनि ॥१५२॥

अ꣣ह꣢म् । इत् । हि । पि꣣तुः꣢ । प꣡रि꣢꣯ । मे꣣धा꣢म् । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । ज꣣ग्र꣡ह꣢ । अ꣣ह꣢म् । सू꣡र्यः꣢꣯ । इ꣣व । अजनि ॥१५२॥

Mantra without Swara
अहमिद्धि पितुष्परि मेधामृतस्य जग्रह । अहꣳ सूर्य इवाजनि ॥

अहम् । इत् । हि । पितुः । परि । मेधाम् । ऋतस्य । जग्रह । अहम् । सूर्यः । इव । अजनि ॥१५२॥

Samveda - Mantra Number : 152
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अहम्-इत्-हि) मैं स्वयं अवश्य ही (पितुः) परमपिता परमात्मा से (ऋतस्य मेधां परि जग्रह) सत्यज्ञान की मेधा को—ऋतम्भरा बुद्धि को पूर्णरूप में पा लेता हूँ उक्त उपासना द्वारा (अहं सूर्यः-इव-अजनि) मैं उपासक सूर्य की भाँति परमात्मा से ज्योति पाकर प्रसिद्ध हो जाता हूँ जैसे परमात्मा से ज्योति पाकर सूर्य प्रसिद्ध होता है।
Essence
उपासक परमात्मा से ऋतम्भरा प्रज्ञा को प्राप्त कर ऐसे प्रसिद्ध हो जाता है जैसे सूर्य परमात्मा से ज्योति पाकर प्रसिद्ध होता है॥८॥
Special
ऋषिः—वत्सः काण्वः (मेधावी का शिष्य या पुत्र अत्यन्त मेधावी अध्यात्म वक्ता जन)॥