Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 151

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣ष्टा꣡ होत्रा꣢꣯ असृक्ष꣣ते꣡न्द्रं꣢ वृ꣣ध꣡न्तो꣢ अध्व꣣रे꣢ । अ꣡च्छा꣢वभृ꣣थ꣡मोज꣢꣯सा ॥१५१॥

इ꣣ष्टाः꣢ । हो꣡त्राः꣢꣯ । अ꣣सृक्षत । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । वृ꣣ध꣡न्तः꣢ । अ꣣ध्वरे꣢ । अ꣡च्छ꣢꣯ । अ꣣वभृथ꣢म् । अ꣣व । भृथ꣢म् । ओ꣡ज꣢꣯सा ॥१५१॥

Mantra without Swara
इष्टा होत्रा असृक्षतेन्द्रं वृधन्तो अध्वरे । अच्छावभृथमोजसा ॥

इष्टाः । होत्राः । असृक्षत । इन्द्रम् । वृधन्तः । अध्वरे । अच्छ । अवभृथम् । अव । भृथम् । ओजसा ॥१५१॥

Samveda - Mantra Number : 151
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अध्वरे) अध्यात्म यज्ञ में (इन्द्रं वृधन्तः) ऐश्वर्यवान् परमात्मा को सम्यक् साक्षात् करने के हेतु (इष्टाः-होत्राः-असृक्षत) अनुकूल या जहाँ तक हो सके आत्मभावनाएँ—स्तुति-प्रार्थनोपासनाएँ हैं, उनको हे उपासको तुम लोग छोड़ो समर्पित करो पुनः (ओजसा) मानस रस से (अवभृथम्-अच्छ) अवभृथ—स्नान को भली प्रकार प्राप्त होओ।
Essence
अध्यात्म यज्ञ—योगानुष्ठान में परमात्मा के साक्षात् करने के हेतु अनुकूल स्तुतिप्रार्थनोपासनाओं को भेंट करो पुनः परमात्मा के सत्संग मानस रस में गोता लगाना चाहिए॥७॥
Special
ऋषिः—श्रुतकक्षः (सुना है अध्यात्मकक्ष जिसने ऐसा जन)॥