Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 149

1875 Mantra
Devata- मरुतः Rishi- बिन्दुः पूतदक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
गौ꣡र्ध꣢यति म꣣रु꣡ता꣣ꣳ श्रव꣣स्यु꣢र्मा꣣ता꣢ म꣣घो꣡ना꣢म् । यु꣣क्ता꣢꣫ वह्नी꣣ र꣡था꣢नाम् ॥१४९॥

गौः꣢ । ध꣣यति । मरु꣡ता꣢म् । श्र꣣वस्युः꣢ । मा꣣ता꣢ । म꣣घो꣡ना꣢म् । यु꣣क्ता꣢ । व꣡ह्निः꣢꣯ । र꣡था꣢꣯नाम् ॥१४९॥

Mantra without Swara
गौर्धयति मरुताꣳ श्रवस्युर्माता मघोनाम् । युक्ता वह्नी रथानाम् ॥

गौः । धयति । मरुताम् । श्रवस्युः । माता । मघोनाम् । युक्ता । वह्निः । रथानाम् ॥१४९॥

Samveda - Mantra Number : 149
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(मघोनां मरुताम्) ज्ञान धन वाले अध्यात्म याजकों की “मरुत ऋत्विङ्नाम” [निघं॰ ३.१८] (अवस्युः) रक्षणेच्छुक (गौः-माता) इन्द्र परमात्मा गौरूप ज्ञानप्रद माता बनकर (धयति) निजामृतरस पिलाता है (रथानां वह्निः) रथों के वहन करने वाले घोड़े की भाँति रमण साधन योगाङ्गों में युक्त हुई वह गौ माता इस लोक परलोक की सुख यात्रा कराती है।
Essence
भाग्यवान् ज्ञानधनवान् आत्मसमर्पी विद्वानों का रक्षण चाहता हुआ इन्द्र परमात्मा गौ माता बनकर उन्हें निज अमृत रस पिलाता है तथा योगाङ्ग रमणसाधनों से युक्त होकर रथों में जुड़े घोड़े की भाँति इस लोक और परलोक की सुख यात्रा भी कराता है॥५॥
Special
ऋषिः—विन्दुः पूतदक्षो वा (सूक्ष्म विवेचनशील या पवित्र ज्ञान बल वाला जन)॥