Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 1482

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- हर्यतः प्रागाथः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣢प꣣ स्र꣡क्वे꣢षु꣣ ब꣡प्स꣢तः कृण्व꣣ते꣢ ध꣣रु꣡णं꣢ दि꣣वि꣢ । इ꣡न्द्रे꣢ अ꣣ग्ना꣢꣫ नमः꣣꣬ स्वः꣢꣯ ॥१४८२॥

उ꣡प꣢꣯ । स्र꣡क्वे꣢꣯षु । ब꣡प्स꣢꣯तः । कृ꣣ण्व꣢ते । ध꣣रु꣡ण꣢म् । दि꣣वि꣢ । इ꣡न्द्रे꣢꣯ । अ꣣ग्ना꣢ । न꣡मः꣢꣯ । स्व३रि꣡ति꣢ ॥१४८२॥

Mantra without Swara
उप स्रक्वेषु बप्सतः कृण्वते धरुणं दिवि । इन्द्रे अग्ना नमः स्वः ॥

उप । स्रक्वेषु । बप्सतः । कृण्वते । धरुणम् । दिवि । इन्द्रे । अग्ना । नमः । स्व३रिति ॥१४८२॥

Samveda - Mantra Number : 1482
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(वप्सतः स्रक्वेषु-उपकृण्वते) जो उपासक भोग कराने वाले—भोग के साधन प्राणों—इन्द्रियों को१३ भोगों में ही न लगाकर—भोग वस्तुओं के अन्दर परमात्मा के सर्जन गुणों१४ को उपयुक्त करते हैं—लगाते हैं (धरुणं दिवि) धारणा साधन१ मन को अमृतधाम—मोक्ष में उपयुक्त करते हैं—लगाते हैं, तथा (इन्द्रे ‘इन्द्रम्’ अग्ना) स्वात्मा को२ ज्ञानप्रकाशस्वरूप परमात्मा में३ उपयुक्त करते हैं लगाते हैं (नमः स्वः) उनके लोक में अन्न४ भोग लाभ और मोक्षधाम में अमृत सुख होता है॥३॥
Special