Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 148

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣢꣫दिन्द्रो꣣ अ꣡न꣢य꣣द्रि꣡तो꣢ म꣣ही꣢र꣣पो꣡ वृष꣢꣯न्तमः । त꣡त्र꣢ पू꣣षा꣡भु꣢व꣣त्स꣡चा꣢ ॥१४८॥

य꣢त् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । अ꣡न꣢꣯यत् । रि꣡तः꣢꣯ । म꣣हीः꣢ । अ꣣पः꣢ । वृ꣡ष꣢꣯न्तमः । त꣡त्र꣢꣯ । पू꣣षा꣢ । अ꣣भुवत् । स꣡चा꣢꣯ ॥१४८॥

Mantra without Swara
यदिन्द्रो अनयद्रितो महीरपो वृषन्तमः । तत्र पूषाभुवत्सचा ॥

यत् । इन्द्रः । अनयत् । रितः । महीः । अपः । वृषन्तमः । तत्र । पूषा । अभुवत् । सचा ॥१४८॥

Samveda - Mantra Number : 148
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(यत्) जब (वृषन्तमः-इन्द्रः) अत्यन्त सुखवृष्टिकर्ता परमात्मा (महीः-रितः-अपः-अनयत्) महती गतिशील व्यापन शक्तियों को प्रेरित करता है (तत्र) तब (सचा) साथ (पूषा अ भुवत्) सूर्य अपना रश्मिप्रसाद करने में और पृथिवी वनस्पति उगाने में समर्थ होती है।
Essence
परमात्मा की व्यापन शक्तियों को पाकर ही सूर्य किरणों का सञ्चार करता है और पृथिवी भी ओषधि वनस्पतियों प्राणियों को उत्पन्न करती है॥४॥
Special
ऋषिः—भरद्वाजः (परमात्म ज्ञान को अपने अन्दर भरण धारण करने वाला)॥