Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 1466

1875 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- यजत आत्रेयः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ऋ꣣त꣢मृ꣣ते꣢न꣣ स꣡प꣢न्तेषि꣣रं꣡ दक्ष꣢꣯माशाते । अ꣣द्रु꣡हा꣢ दे꣣वौ꣡ व꣢र्धेते ॥१४६६॥

ऋ꣣त꣢म् । ऋ꣣ते꣡न꣢ । स꣡प꣢꣯न्ता । इ꣣षिर꣢म् । द꣡क्ष꣢꣯म् । आ꣣शातेइ꣡ति꣢ । अ꣣द्रु꣡हा꣢ । अ꣣ । द्रु꣡हा꣢꣯ । दे꣣वौ꣢ । व꣣र्धेतेइ꣡ति꣢ ॥१४६६॥

Mantra without Swara
ऋतमृतेन सपन्तेषिरं दक्षमाशाते । अद्रुहा देवौ वर्धेते ॥

ऋतम् । ऋतेन । सपन्ता । इषिरम् । दक्षम् । आशातेइति । अद्रुहा । अ । द्रुहा । देवौ । वर्धेतेइति ॥१४६६॥

Samveda - Mantra Number : 1466
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(ऋतम्) अमृत—न मरने वाले उपासक आत्मा को (ऋतेन) अमृतरूप मोक्ष के साथ३ (सपन्ता) समवेत करता हुआ४ ‘मित्र’ संसार में कर्मभोग के लिये प्रेरक, ‘वरुण’ अपनी ओर अपवर्ग—मोक्षार्थ वरने वाला परमात्मा (इषिरं दक्षम्) एषणीय भोग को और समृद्ध सुख या प्रज्ञान—प्रकृष्ट ज्ञान—अनुभूत होने वाले मोक्ष को५ (आशाते) प्राप्त कराता है (देवौ-अद्रुहा वर्धेते) दोनों धर्मों वाला परमात्मा द्रोहरहित आपतु उपासक आत्मा को बढ़ाता है—उन्नत करता है॥२॥
Special