Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 146

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣मा꣡ उ꣢ त्वा पुरूवसो꣣ऽभि꣡ प्र नो꣢꣯नुवु꣣र्गि꣡रः꣢ । गा꣡वो꣢ व꣣त्सं꣢꣫ न धे꣣न꣡वः꣢ ॥१४६॥

इ꣣माः꣢ । उ꣣ । त्वा । पुरूवसो । पुरु । वसो । अभि꣢ । प्र । नो꣣नुवुः । गि꣡रः꣢꣯ । गा꣡वः꣢꣯ । व꣣त्स꣢म् । न । धे꣣न꣡वः꣢ ॥१४६॥

Mantra without Swara
इमा उ त्वा पुरूवसोऽभि प्र नोनुवुर्गिरः । गावो वत्सं न धेनवः ॥

इमाः । उ । त्वा । पुरूवसो । पुरु । वसो । अभि । प्र । नोनुवुः । गिरः । गावः । वत्सम् । न । धेनवः ॥१४६॥

Samveda - Mantra Number : 146
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(पुरूवसो) हे बहुत धनवाले—विविध धन प्रदाता परमात्मन्! (इमाः-गिरः) ये मेरी वाणियाँ या वेदवाणियाँ (त्वा-अभि उ) तुझे ही—तेरे प्रति ही (प्रनोनुवुः) स्तवन करती जा रही हैं (धेनवः-गावः-वत्सं न) जैसे दुधारी—दूध पिलानेवाली गौवें बछड़े की ओर जा रही होती हैं।
Essence
हे बहुत धन वाले परमात्मन्! मेरी स्नेहमयी वाणियाँ या वेदवाणियाँ तेरे प्रति ही स्तुति करती हुई झुकी जा रही हैं—मेरी कोई भी वाणी या वेदवाणी ऐसी नहीं जो स्तुति न करती हो ऐसी सारी वाणियाँ तेरी स्तुतिपरायण तेरी ओर झुकी जा रही हैं, जैसे दूध पिलाने वाली गौवें बछड़े को दूध पिलाने दौड़ी जा रही हों। स्नेह प्रदर्शनमात्र में उपमा है। गौवें दूध पिलाने दौड़ रही हैं पर वाणियाँ स्नेहपूर्ण गुणगान करती हुई स्नेह से अपनाने जा रही हैं॥२॥
Special
ऋषिः—मेधातिथिः (मेधा से अतन गमनशील)॥