Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 143

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
उ꣣पह्वरे꣡ गि꣢री꣣णा꣡ꣳ स꣢ङ्ग꣣मे꣡ च꣢ न꣣दी꣡ना꣢म् । धि꣣या꣡ विप्रो꣢꣯ अजायत ॥१४३॥

उ꣣पह्वरे꣢ । उ꣣प । ह्वरे꣢ । गि꣣रीणाम् । स꣢ङ्गमे꣢ । स꣣म् । गमे꣢ । च꣣ । न꣡दीना꣢म् । धि꣣या꣢ । वि꣡प्रः꣢꣯ । वि । प्रः꣣ । अजायत ॥१४३॥

Mantra without Swara
उपह्वरे गिरीणाꣳ सङ्गमे च नदीनाम् । धिया विप्रो अजायत ॥

उपह्वरे । उप । ह्वरे । गिरीणाम् । सङ्गमे । सम् । गमे । च । नदीनाम् । धिया । विप्रः । वि । प्रः । अजायत ॥१४३॥

Samveda - Mantra Number : 143
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(गिरीणाम्-उपह्वरे) पर्वतों के प्रान्त में (च) और (नदीनां सङ्गमे) नदियों के सङ्गम में (धिया) ध्यान प्रज्ञा से (विप्रः-अजायत) मेधावी बन जाता है उनकी स्थिति गति सङ्गति का विवेचन एवं परमात्मा का ध्यान करने से ब्रह्मज्ञान में कुशल हो जाता है।
Essence
पर्वतों के प्रान्त भागों और नदियों के सङ्गमों पर विवेचन एवं वहाँ परमात्मा का ध्यान करने से ब्रह्मज्ञान में समर्थ ब्रह्मा बन जाया करता है, सदा नहीं तो कभी-कभी अवश्य उन स्थानों पर जाकर रहना ध्यान करना चाहिए॥९॥
Special
ऋषिः—वत्सः (अध्यात्म वक्ता)॥