Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 1428

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ꣣भी꣡ नो꣢ अर्ष दि꣣व्या꣡ वसू꣢꣯न्य꣣भि꣢꣫ विश्वा꣣ पा꣡र्थि꣢वा पू꣣य꣡मा꣢नः । अ꣣भि꣢꣫ येन꣣ द्र꣡वि꣢णम꣣श्न꣡वा꣢मा꣣꣬भ्या꣢꣯र्षे꣣यं꣡ ज꣢मदग्नि꣣व꣡न्नः꣢ ॥१४२८॥

अभि꣢ । नः꣣ । अर्ष । दिव्या꣢ । व꣡सू꣢꣯नि । अ꣣भि꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯ । पा꣡र्थि꣢꣯वा । पू꣣य꣡मा꣢नः । अ꣣भि꣢ । ये꣡न꣢꣯ । द्र꣡वि꣢꣯णम् । अ꣣श्न꣡वा꣢म । अ꣣भि꣢ । आर्षेय꣢म् । ज꣣मदग्निव꣢त् । ज꣣मत् । अग्निव꣢त् । नः꣣ ॥१४२८॥

Mantra without Swara
अभी नो अर्ष दिव्या वसून्यभि विश्वा पार्थिवा पूयमानः । अभि येन द्रविणमश्नवामाभ्यार्षेयं जमदग्निवन्नः ॥

अभि । नः । अर्ष । दिव्या । वसूनि । अभि । विश्वा । पार्थिवा । पूयमानः । अभि । येन । द्रविणम् । अश्नवाम । अभि । आर्षेयम् । जमदग्निवत् । जमत् । अग्निवत् । नः ॥१४२८॥

Samveda - Mantra Number : 1428
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(पूयमानः) हे सोम—शान्त परमात्मन्! तू अध्येषमाण हुआ आकर्षित हुआ (नः) हमारे (दिव्या वसूनि-अभि-अर्ष) दिव्य आकाश से प्राप्त होने वाले वास साधनों—वृष्टि, ज्योति, अवश्याय=ओस, रात्रि, वायु को अभिगत हो प्राप्त हो—इन्हें सेवन करते हुए तेरा स्मरण करें (येन ‘यद्’ द्रविणम्-अश्नवामः-अभि) जिस३ धन को हम भोगें उसे तू अभिगत हो—प्राप्त हो उस भोग के साथ तेरा धन्यवाद करें (आर्षेयं जमदग्निवत्-अभि) ऋषियों से श्रुतज्ञान नेत्र वाला नेत्रदृष्ट४ साक्षात् है उसे अभिगत—प्राप्त हो उससे तेरा मनन करें॥३॥
Special