Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 138

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- कुसीदी काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
दे꣣वा꣢ना꣣मि꣡दवो꣢꣯ म꣣ह꣡त्तदा वृ꣢꣯णीमहे व꣣य꣢म् । वृ꣡ष्णा꣢म꣣स्म꣡भ्य꣢मू꣣त꣡ये꣢ ॥१३८॥

दे꣣वा꣡ना꣢म् । इत् । अ꣡वः꣢꣯ । म꣣ह꣢त् । तत् । आ । वृ꣣णीमहे । वय꣢म् । वृ꣡ष्णा꣢꣯म् । अ꣣स्म꣡भ्य꣢म् । ऊ꣣त꣡ये꣢ ॥१३८॥

Mantra without Swara
देवानामिदवो महत्तदा वृणीमहे वयम् । वृष्णामस्मभ्यमूतये ॥

देवानाम् । इत् । अवः । महत् । तत् । आ । वृणीमहे । वयम् । वृष्णाम् । अस्मभ्यम् । ऊतये ॥१३८॥

Samveda - Mantra Number : 138
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(वृष्णां देवानां-इत् तत्-महत्-अवः) ज्ञानवर्षक इन्द्र परमात्मा एवं ऋषि विद्वानों के अवश्य उस भारी बोध ज्ञान को “अव रक्षण-बोध......” [तुदादि॰] (वयम्-आवृणीमहे) हम समन्तरूप से वरते हैं (अस्मभ्यम्-ऊतये) जो हमारी रक्षा के लिए है।
Essence
परमात्मा और ऋषि विद्वानों के वेदज्ञान को अवश्य स्वीकार करें अपने अन्दर धारण करें जो हमारी रक्षा इस संसार में करता है॥४॥
Special
ऋषिः—कुसीदी काण्वः (मेधावी का शिष्य संश्लेषण धर्मवाला)॥