Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 137

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
स꣡म꣢स्य म꣣न्य꣢वे꣣ वि꣢शो꣣ वि꣡श्वा꣢ नमन्त कृ꣣ष्ट꣡यः꣢ । स꣣मुद्रा꣡ये꣢व꣣ सि꣡न्ध꣢वः ॥१३७॥

स꣢म् । अ꣣स्य । मन्य꣡वे꣢ । वि꣡शः꣢꣯ । वि꣡श्वाः꣢꣯ । न꣣मन्त । कृष्ट꣡यः꣢ । स꣣मुद्राय । स꣣म् । उद्रा꣡य꣢ । इ꣣व । सि꣡न्ध꣢꣯वः । ॥१३७॥

Mantra without Swara
समस्य मन्यवे विशो विश्वा नमन्त कृष्टयः । समुद्रायेव सिन्धवः ॥

सम् । अस्य । मन्यवे । विशः । विश्वाः । नमन्त । कृष्टयः । समुद्राय । सम् । उद्राय । इव । सिन्धवः । ॥१३७॥

Samveda - Mantra Number : 137
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अस्य) इस इन्द्र ऐश्वर्यवान् परमात्मा के (मन्यवे) दीप्त प्रकाशस्वरूप प्राप्ति के लिये “मन्युर्मन्यतेर्दीप्तिकर्मणः” [निरु॰ १०.३.३०] (विश्वा-विशः कृष्टयः) सब प्रवेश करने वाली मनुष्य प्रजाएँ (सम्-नमन्त) द्रवीभूत होती हैं झुकी जाती हैं (समुद्राय सिन्धवः-इव) समुद्र के लिये—समुद्र को पाने के लिये जैसे नदियाँ झुकी चली जाती हैं।
Essence
परमात्मा के प्रकाशस्वरूप को पाने के लिये उसमें प्रवेश करने के लिये सब जन उसकी ओर झुकते चले जाया करते हैं जैसे नदियाँ समुद्र को पाने के लिए झुकती चली जाती हैं॥३॥
Special
ऋषिः—वत्सः काण्वः (मेधावी का शिष्य वक्ता)॥