Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 136

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣म꣡ उ꣢ त्वा꣣ वि꣡ च꣢क्षते꣣ स꣡खा꣢य इन्द्र सो꣣मि꣡नः꣢ । पु꣣ष्टा꣡व꣢न्तो꣣ य꣡था꣢ प꣣शु꣢म् ॥१३६॥

इ꣣मे꣢ । उ꣣ । त्वा । वि꣢ । च꣣क्षते । स꣡खा꣢꣯यः । स । खा꣣यः । इन्द्र । सो꣡मिनः꣢ । पु꣣ष्टा꣡व꣢न्तः । य꣡था꣢꣯ । प꣣शु꣢म् ॥१३६॥

Mantra without Swara
इम उ त्वा वि चक्षते सखाय इन्द्र सोमिनः । पुष्टावन्तो यथा पशुम् ॥

इमे । उ । त्वा । वि । चक्षते । सखायः । स । खायः । इन्द्र । सोमिनः । पुष्टावन्तः । यथा । पशुम् ॥१३६॥

Samveda - Mantra Number : 136
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) ऐश्वर्यवन् परमात्मन्! (इमे सखायः सोमिनः) ये समान ख्यान उपासक विद्वान् अपने सोम उपासनारस लिए हुए (उ) निश्चय (त्वा विचक्षते) तुझे निहार रहे हैं (यथा पुष्टावन्तः पशुम्) जैसे पोषण पदार्थवाले घास दाना आदि लिए हुए “पुष्टेषु पशुम्” [निरु॰ १३.५] अपने दूध देनेवाले गौ आदि पशु को निहारते हैं।
Essence
परमात्मन्! तेरे उपासक अपनी इष्टसिद्धि के लिये अपने उपासनारस को समर्पित करने के लिए तुझे ऐसे निहारते हैं जैसे दूध के इच्छुकजन घास दाना आदि पुष्टि कर वस्तु लिये दूध देने वाले गौ आदि पशु को निहारते हैं॥२॥
Special
ऋषिः—त्रिशोकः (ज्ञान कर्म उपासना में दीप्तजन)॥ देवता—इन्द्रः॥