Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 135

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- कण्वो घौरः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣हे꣡व꣢ शृण्व एषां꣣ क꣢शा꣣ ह꣡स्ते꣢षु꣣ य꣡द्वदा꣢꣯न् । नि꣡ यामं꣢꣯ चि꣣त्र꣡मृ꣢ञ्जते ॥१३५॥

इ꣣ह꣢ । इ꣣व । शृण्वे । एषाम् । क꣡शाः꣢꣯ । ह꣡स्ते꣢꣯षु । यत् । व꣡दा꣢꣯न् । नि । या꣡म꣢꣯न् । चि꣣त्र꣢म् । ऋ꣣ञ्जते ॥१३५॥

Mantra without Swara
इहेव शृण्व एषां कशा हस्तेषु यद्वदान् । नि यामं चित्रमृञ्जते ॥

इह । इव । शृण्वे । एषाम् । कशाः । हस्तेषु । यत् । वदान् । नि । यामन् । चित्रम् । ऋञ्जते ॥१३५॥

Samveda - Mantra Number : 135
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(एषां हस्तेषु कशाः) इन इन्द्र सखाजनों “इन्द्रस्य वै मरुतः” [कौ॰ ५.४.५] ऋत्विजों विद्वानों के “मरुतः ऋत्विजः” [निघं॰ ३.१८] सप्तप्राण, लोकों के सात प्राण स्थानों में—“सप्त हस्तास इति येषु सप्तसु लोकेषु चरन्ति प्राणा गुहाशयाः” [काठक॰ २५.२-३] “सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणाः” [मुण्ड॰ २.८] वाणियों—वेदवाणियों को “कशा वाङ् नाम” [निघं॰ १.११] (इह-इव शृण्वे) यहाँ अपने अन्दर जैसा ही मैं सुनता हूँ (यत्-वदान्) कि जैसे मैं बोलता हूँ (यामन् चित्रम्-नि-ऋञ्जते) कि जो इन्द्र ऐश्वर्यवान् परमात्मा अध्यात्म मार्ग में या अध्यात्म कर्म में “यामे कर्मणि” [श॰ ६.३.२.३] अद्भुतरूप में अर्न्तदृष्टि से साथ प्रसिद्ध करता है, साक्षात् करता है “ऋञ्जति प्रसाधनकर्मा” [निरु॰ ६.२१]।
Essence
विद्वान् जन अपने प्राणसंस्थानों में जिन वेदवाणियों को धारण कर यज्ञ आदि प्रसङ्ग में बोलते हैं मैं अध्यात्म यज्ञ का याजक उन ईश्वरीय वाणियों को अपने अन्तःकरण में सुनता हूँ वह परमात्मा अध्यात्म मार्ग या अध्यात्म कर्म में उन वेदवाणियों को सुन्दर रूप में सार्थ प्रसिद्ध कर देता है साक्षात् समझा देता है॥१॥
Special
छन्दः—गायत्री। स्वरः—षड्जः। ऋषिः—कण्वो घौरः (वक्ता का शिष्य मेधावी)॥ देवताः—इन्द्रसखायो मरुतः (ऐश्वर्यवान् परमात्मा और उसके सखा अग्नि आदि ऋषिजन)॥